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Yajurveda - Mantra 13

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 13

21 Mantra
37/13
Devata- विद्वान् देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्वाहा॑ म॒रुद्भिः॒ परि॑ श्रीयस्व दि॒वः स॒ꣳस्पृश॑स्पाहि।मधु॒ मधु॒ मधु॑॥१३॥

स्वाहा॑। म॒रुद्भि॒रिति॑ म॒रुत्ऽभिः॑। परि॑। श्री॒य॒स्व॒। दि॒वः। स॒ꣳस्पृश॒ इति॑ स॒म्ऽस्पृशः॑। पा॒हि॒ ॥ मधु॑। मधु॑। मधु॑ ॥१३ ॥

Mantra without Swara
स्वाहा मरुद्भिः परिश्रीयस्व । दिवः सँस्पृशस्पाहि । मधु मधु मधु ॥

स्वाहा। मरुद्भिरिति मरुत्ऽभिः। परि। श्रीयस्व। दिवः। सꣳस्पृश इति सम्ऽस्पृशः। पाहि॥ मधु। मधु। मधु॥१३॥

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Meaning
हे विद्वन्! आप (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (स्वाहा) सत्क्रिया (मधु) कर्म (मधु) उपासना और (मधु) विज्ञान का (श्रीयस्व) सेवन कीजिये तथा (संस्पृशः) सम्यक् स्पर्श करनेवाली (दिवः) प्रकाशरूप बिजुली से हमारी (परि, पाहि) सब ओर से रक्षा कीजिये॥१३॥
Essence
जो लोग पूर्ण विद्वानों के साथ कर्म, उपासना और ज्ञान की विद्या तथा उत्तम क्रिया को ग्रहण कर सेवन करते हैं, वे सब ओर से रक्षा को प्राप्त हुए बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥