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Yajurveda Adhyay 36 / Mantra 6

24 Mantra
36/6
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- पादनिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒भी षु णः॒ सखी॑नामवि॒ता ज॑रितॄ॒णाम्।श॒तं भ॑वास्यू॒तिभिः॑॥६॥

अ॒भी। सु। नः॒। सखी॑नाम्। अ॒वि॒ता। ज॒रि॒तॄ॒णाम् ॥ श॒तम्। भ॒वा॒सि॒। ऊ॒तिभिः॑६ ॥

Mantra without Swara
अभी षु णः सखीनामविता जरितऋृणाम् । शतम्भवास्यूतये ॥

अभी। सु। नः। सखीनाम्। अविता। जरितॄणाम्॥ शतम्। भवासि। ऊतिभिः६॥

Meaning
हे जगदीश्वर! आप (शतम्) असंख्य ऐश्वर्य देते हुए (अभि, ऊतिभिः) सब ओर से प्रवृत्त रक्षादि क्रियाओं से (नः) हमारे (सखीनाम्) मित्रों और (जरितॄणाम्) सत्य स्तुति करनेवालों के (अविता) रक्षा करनेवाले (सु, भवासि) सुन्दर प्रकार हूजिये, इससे आप हमको सत्कार करने योग्य हैं॥६॥
Essence
हे मनुष्यो! जो रागद्वेष रहित, किन्हीं से वैरभाव न रखने अर्थात् सबसे मित्रता रखनेवाला, सब मित्र मनुष्यों को असंख्य ऐश्वर्य और अधिकतर विज्ञान देके सब ओर से रक्षा करता है, उसी परमेश्वर की नित्य सेवा किया करो॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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