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Yajurveda Adhyay 36 / Mantra 4

24 Mantra
36/4
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कया॑ नश्चि॒त्रऽ आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑।कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता॥४॥

कया॑। नः॒। चि॒त्रः। आ। भु॒व॒त्। ऊ॒ती। स॒दावृ॑ध॒ इति॑ स॒दाऽवृ॑धः। सखा॑ ॥ कया॑। शचि॑ष्ठया। वृ॒ता ॥४ ॥

Mantra without Swara
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥

कया। नः। चित्रः। आ। भुवत्। ऊती। सदावृध इति सदाऽवृधः। सखा॥ कया। शचिष्ठया। वृता॥४॥

Meaning
वह (सदावृधः) सदा बढ़नेवाला अर्थात् कभी न्यूनता को नहीं प्राप्त हो (चित्रः) आश्चर्य्यरूप गुणकर्मस्वभावों से युक्त परमेश्वर (नः) हम लोगों का (कया) किस (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (सखा) मित्र (आ, भुवत्) होवे तथा (कया) किस (वृता) वर्त्तमान (शचिष्ठया) अत्यन्त उत्तम बुद्धि से हमको शुभ गुणकर्मस्वभावों में प्रेरणा करे॥४॥
Essence
हम लोग इस बात को यथार्थ प्रकार से नहीं जानते कि वह ईश्वर किस युक्ति से हमको प्रेरणा करता है कि जिसके सहाय से ही हम लोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्षों के सिद्ध करने को समर्थ हो सकते हैं॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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