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Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 6

22 Mantra
35/6
Devata- यमो देवता Rishi- सड्कसुक ऋषिः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्र॒जाप॑तौ त्वा दे॒वता॑या॒मुपो॑दके लो॒के नि द॑धाम्यसौ।अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥६॥

प्र॒जाप॑ता॒विति॑ प्र॒जाऽप॑तौ। त्वा॒। दे॒वता॑याम्। उपो॑दक॒ इत्युप॑ऽउदके। लो॒के। नि। द॒धा॒मि॒। अ॒सौ॒ ॥ अप॑। नः॒। शोशु॑चत्। अ॒घम् ॥६ ॥

Mantra without Swara
प्रजापतौ त्वा देवतायामुपोदके लोके निदधाम्यसौ । अप नः शोशुचदघम् ॥

प्रजापताविति प्रजाऽपतौ। त्वा। देवतायाम्। उपोदक इत्युपऽउदके। लोके। नि। दधामि। असौ॥ अप। नः। शोशुचत्। अघम्॥६॥

Meaning
हे जीव! जो (असौ) यह लोक (नः) हमारे (अघम्) पाप को (अप, शोशुचत्) शीघ्र सुखा देवे, उस (प्रजापतौ) प्रजा के रक्षक (देवतायाम्) पूजनीय परमेश्वर में तथा (उपोदके) उपगत समीपस्थ उदक जिसमें हों (लोके) दर्शनीय स्थान में (त्वा) आप को (नि दधामि) निरन्तर धारण करता हूं॥६॥
Essence
हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर उपासना किया हुआ पापाचरण से पृथक् कराता है, उसी में भक्ति करने के लिये तुमको मैं स्थिर करता हूं, जिससे सदैव तुम लोग श्रेष्ठ सुख के देखने को प्राप्त होओ॥६॥
Subject
ईश्वर की उपासना का विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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