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Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 10

22 Mantra
35/10
Devata- आपो देवताः Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अश्म॑न्वती रीयते॒ सꣳर॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत॒ प्र त॑रता सखायः।अत्रा॑ जही॒मोऽशि॑वा॒ येऽ अस॑ञ्छि॒वान्व॒यमुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न्॥१०॥

अश्म॑न्व॒तीत्यश्म॑न्ऽवती। री॒य॒ते॒। सम्। र॒भ॒ध्व॒म्। उत्। ति॒ष्ठ॒त॒। प्र। त॒र॒त॒। स॒खा॒यः॒ ॥अत्र॑। ज॒ही॒मः॒। अशि॑वाः। ये। अस॑न्। शि॒वान्। व॒यम्। उत्। त॒रे॒म॒। अ॒भि। वाजा॑न् ॥१० ॥

Mantra without Swara
अश्मन्वती रीयते सँ रभध्वमुत्तिष्ठत प्र तरता सखायः । अत्र जहीमो शिवा येऽअसञ्छिवान्वयमुत्तरेमाभि वाजान् ॥

अश्मन्वतीत्यश्मन्ऽवती। रीयते। सम्। रभध्वम्। उत्। तिष्ठत। प्र। तरत। सखायः॥अत्र। जहीमः। अशिवाः। ये। असन्। शिवान्। वयम्। उत्। तरेम। अभि। वाजान्॥१०॥

Meaning
हे (सखायः) मित्रो! जो (अश्मन्वती) बहुत मेघों वा पत्थरोंवाली सृष्टि वा नदी प्रवाह से (रीयते) चलती है उसके साथ जैसे (वयम्) हम लोग (ये) जो (अत्र) इस जगत् में वा समय में (अशिवाः) अकल्याणकारी (असन्) हैं, उनको (जहीमः) छोड़ते हैं तथा (शिवान्) सुखकारी (वाजान्) अत्युत्तम अन्नादि के भागों को (अभि, उत्, तरेम) सब ओर से पार करें अर्थात् भोग चुकें वैसे तुम लोग (संरभध्वम्) सम्यक् आरम्भ करो (उत्तिष्ठत) उद्यत होओ और (प्रतरत) दुःखों का उल्लङ्घन करो॥१०॥
Essence
जो मनुष्य बड़ी नौका से समुद्र के जैसे पार हों, वैसे अशुभ आचरणों और दुष्ट जनों के पार हो प्रयत्न के साथ उद्यमी होके मङ्गलकारी आचरण करें, वे सहज से दुःखसागर के पार होवें॥१०॥
Subject
कौन लोग दुःख के पार होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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