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Yajurveda - Mantra 1

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 1

22 Mantra
35/1
Devata- पितरो देवताः Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- पिपीलिकामध्या निचृदगायत्री, प्राजापत्या बृहती Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अपे॒तो य॑न्तु प॒णयोऽसु॑म्ना देवपी॒ययवः॑।अ॒स्य लो॒कः सु॒ताव॑तःद्युभि॒रहो॑भिर॒क्तुभि॒र्व्यक्तं य॒मो द॑दात्वव॒सान॑मस्मै॥१॥

अप॑। इ॒तः। य॒न्तु॒। प॒णयः॑। असु॑म्ना। दे॒व॒पी॒यव॒ इति॑ दे॑वऽपी॒यवः॑। अ॒स्य। लो॒कः। सु॒ताव॑तः। सु॒तव॑त॒ इति॑ सु॒तऽव॑तः ॥ द्युभि॒रिति॒ द्युभिः॑। अहो॑भि॒रित्यहः॑ऽभिः। अ॒क्तुभि॒रित्य॒क्तुऽभिः॑। व्य᳖क्त॒मिति॒ विऽअ॑क्तम्। य॒मः। द॒दा॒तु॒। अ॒व॒सान॒मित्य॑व॒ऽसान॑म्। अ॒स्मै॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
अपेतो यन्तु पणयो सुम्ना देवपीयवः । अस्य लोकः सुतावतः । द्युभिरहोभिरक्तुभिर्व्यक्तँयमो ददात्ववसानमस्मै ॥

अप। इतः। यन्तु। पणयः। असुम्ना। देवपीयव इति देवऽपीयवः। अस्य। लोकः। सुतावतः। सुतवत इति सुतऽवतः॥ द्युभिरिति द्युभिः। अहोभिरित्यहःऽभिः। अक्तुभिरित्यक्तुऽभिः। व्यक्तमिति विऽअक्तम्। यमः। ददातु। अवसानमित्यवऽसानम्। अस्मै॥१॥

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1 Bhashyas
Meaning
जो (देवपीयवः) विद्वानों के द्वेषी (पणयः) व्यवहारी लोग दूसरों के लिये (असुम्नाः) दुःखों को देते हैं, वे (इतः) यहां से (अप, यन्तु) दूर जावें (लोकः) देखने योग्य (यमः) सबका नियन्ता परमात्मा (द्युभिः) प्रकाशमान (अहोभिः) दिन (अक्तुभिः) और रात्रियों के साथ (अस्य) इस (सुतावतः) वेद वा विद्वानों से प्रेरित प्रशस्त कर्मों वाले जनों के सम्बन्धी (अस्मै) इस मनुष्य के लिये (व्यक्तम्) प्रसिद्ध (अवसानम्) अवकाश को (ददातु) देवे॥१॥
Essence
जो लोग आप्त सत्यवादी धर्मात्मा विद्वानों से द्वेष करते, वे शीघ्र ही दुःख को प्राप्त होते हैं। जो जीव शरीर छोड़ के जाते हैं, उनके लिये यथायोग्य अवकाश देकर उनके कर्मानुसार परमेश्वर सुख-दुःख फल देता है॥१॥
Subject
अब व्यवहार और जीव की गति विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥