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Yajurveda - Mantra 9

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 9

58 Mantra
34/9
Devata- अनुमतिर्देवता Rishi- अगस्त्य ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अनु॑ नो॒ऽद्यानु॑मतिर्य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ मन्यताम्।अ॒ग्निश्च॑ हव्य॒वाह॑नो॒ भव॑तं दा॒शुषे॒ मयः॑॥९॥

अनु॑। नः॒। अ॒द्य। अनु॑मति॒रित्यनु॑ऽमतिः। य॒ज्ञम्। दे॒वेषु॑। म॒न्य॒ता॒म् ॥ अ॒ग्निः। च॒। ह॒व्य॒वाह॑न॒ इति॑ हव्य॒ऽवाह॑नः। भव॑तम्। दा॒शुषे॑ मयः॑ ॥९ ॥

Mantra without Swara
अनु नोद्यानुमतिर्यज्ञन्देवेषु मन्यताम् । अग्निश्च हव्यवाहनो भवतन्दाशुषे मयः ॥

अनु। नः। अद्य। अनुमतिरित्यनुऽमतिः। यज्ञम्। देवेषु। मन्यताम्॥ अग्निः। च। हव्यवाहन इति हव्यऽवाहनः। भवतम्। दाशुषे मयः॥९॥

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अनुमतिः) अनूकूल विज्ञानवाला जन (अद्य) आज (देवेषु) विद्वानों में (नः) हमारे (यज्ञम्) सुख देने के साधनरूप व्यवहार को (अनु, मन्यताम्) अनुकूल माने, वह (च) और (हव्यवाहनः) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी वा अग्निविद्या का विद्वान् तुम दोनों (दाशुषे) दानशील मनुष्य के लिये (मयः) सुखकारी (भवतम्) होओ॥९॥
Essence
जो मनुष्य सत्कर्मों के अनुष्ठान में अनुमति देने और दुष्टकर्मों के अनुष्ठान को निषेध करनेवाले हैं, वे अग्नि आदि की विद्या से सबके लिये सुख देवें॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥