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Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 37

58 Mantra
34/37
Devata- भगो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्यामो॒त प्र॑पि॒त्वऽउ॒त मध्ये॒ऽअह्ना॑म्।उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य्य॑स्य व॒यं दे॒वाना॑ सुम॒तौ स्या॑म॥३७॥

उ॒त। इ॒दानी॑म्। भग॑वन्त॒ इति॒ भग॑ऽवन्तः। स्या॒म॒। उ॒त। प्र॒पि॒त्व इति॑ प्रऽपि॒त्वे। उ॒त। मध्ये॑। अह्ना॑म् ॥ उ॒त। उदि॒तेत्युत्ऽइ॑ता। म॒घ॒व॒न्निति॑ मघऽवन्। सूर्य्य॑स्य। व॒यम्। दे॒वाना॑म्। सु॒म॒ताविति॑ सुऽम॒तौ। स्या॒म॒ ॥३७ ॥

Mantra without Swara
उतेदानीम्भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्येऽअह्नाम् । उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयन्देवानाँ सुमतौ स्याम ॥

उत। इदानीम्। भगवन्त इति भगऽवन्तः। स्याम। उत। प्रपित्व इति प्रऽपित्वे। उत। मध्ये। अह्नाम्॥ उत। उदितेत्युत्ऽइता। मघवन्निति मघऽवन्। सूर्य्यस्य। वयम्। देवानाम्। सुमताविति सुऽमतौ। स्याम॥३७॥

Meaning
हे (मघवन्) उत्तम धनयुक्त ईश्वर वा विद्वन्! (वयम्) हम लोग (इदानीम्) वर्त्तमान समय में (उत) और (प्रपित्वे) पदार्थों की प्राप्ति में (उत) और भविष्यकाल में (उत) और (अह्नाम्) दिनों में (मध्ये) बीच (भगवन्तः) (स्याम) समस्त ऐश्वर्य से युक्त हों। (उत) और (सूर्यस्य) सूर्य के (उदिता) उदय समय तथा (देवानाम्) विद्वानों की (सुमतौ) उत्तम बुद्धि में समस्त ऐश्वर्ययुक्त (स्याम) हों॥३७॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि वर्त्तमान और भविष्यत् काल में योग के ऐश्वर्यों की उन्नति से लौकिक व्यवहार के बढ़ाने और प्रशंसा में निरन्तर प्रयत्न करें॥३७॥
Subject
अब ऐश्वर्य की उन्नति का विषय कहते हैं॥

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