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Yajurveda - Mantra 32

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 32

58 Mantra
34/32
Devata- रात्रिर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- पथ्या बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ रा॑त्रि॒ पार्थि॑व॒ꣳ रजः॑ पि॒तुर॑प्रायि॒ धाम॑भिः।दि॒वः सदा॑सि बृह॒ती वि ति॑ष्ठस॒ऽआ त्वे॒षं व॑र्त्तते॒ तमः॑॥३२॥

आ। रा॒त्रि॒। पार्थि॑वम्। रजः॑। पि॒तुः। अ॒प्रा॒यि॒। धाम॑भि॒रिति॒ धाम॑ऽभिः ॥ दि॒वः। सदा॑सि। बृ॒ह॒ती। वि। ति॒ष्ठ॒से॒। आ। त्वे॒षम्। व॒र्त्त॒ते॒। तमः॑ ॥३२ ॥

Mantra without Swara
आ रात्रि पर्थिवँ रजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवः सदाँसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषँवर्तते तमः ॥

आ। रात्रि। पार्थिवम्। रजः। पितुः। अप्रायि। धामभिरिति धामऽभिः॥ दिवः। सदासि। बृहती। वि। तिष्ठसे। आ। त्वेषम्। वर्त्तते। तमः॥३२॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जो (बृहती) बड़ी (रात्रि) रात (दिवः) प्रकाश के (सदांसि) स्थानों को (वि, तिष्ठसे) व्याप्त होती है, जिस रात्रि ने (पितुः) अपने तथा सूर्य के मध्यस्थ लोक के (धामभिः)सब स्थानों के साथ (पार्थिवम्) पृथिवी सम्बन्धी (रजः) लोक को (आ, अप्रायि) अच्छे प्रकार पूर्ण किया है, जिसका (त्वेषम्) अपनी कान्ति से बढ़ा हुआ (तमः) अन्धकार (आ) (वर्त्तते) आता-जाता है, उसका युक्ति के साथ सेवन करो॥३२॥
Essence
हे मनुष्यो! जो पृथिव्यादि की छाया रात्रि में प्रकाश को रोकती अर्थात् सबका आवरण करती है, उसका आप लोग यथावत् सेवन करें॥३२॥
Subject
अब रात्रि का वर्णन अगले मन्त्र में करते हैं॥