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Yajurveda - Mantra 26

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 26

58 Mantra
34/26
Devata- सविता देवता Rishi- आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यहस्तो॒ऽअसु॑रः सुनी॒थः सु॑मृडी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ्।अ॒प॒सेध॑न् र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द् दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः॥२६॥

हिर॑ण्यहस्त॒ इति॒ हिर॑ण्यऽहस्तः। असु॑रः। सु॒नी॒थ इति॑ सुऽनी॒थः। सु॒मृ॒डी॒क इति॑ सुमृडी॒कः। स्ववा॒निति॒ स्वऽवा॑न्। या॒तु॒। अ॒र्वाङ् ॥ अ॒प॒सेध॒न्नित्य॑प॒ऽसेध॑न्। र॒क्षसः॑। या॒तु॒धाना॒निति॑ यातु॒ऽधाना॑न्। अस्था॑त्। दे॒वः। प्र॒ति॒दो॒षमिति॑ प्रतिऽदो॒षम्। गृ॒णा॒नः ॥२६ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यहस्तोऽअसुरः सुनीथः सुमृडीकः स्ववा यात्वर्वाङ् । अपसेधन्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषङ्गृणानः ॥

हिरण्यहस्त इति हिरण्यऽहस्तः। असुरः। सुनीथ इति सुऽनीथः। सुमृडीक इति सुमृडीकः। स्ववानिति स्वऽवान्। यातु। अर्वाङ्॥ अपसेधन्नित्यपऽसेधन्। रक्षसः। यातुधानानिति यातुऽधानान्। अस्थात्। देवः। प्रतिदोषमिति प्रतिऽदोषम्। गृणानः॥२६॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जो (हिरण्यहस्तः) हाथों के तुल्य प्रकाशोंवाला (सुनीथः) सुन्दर प्रकार प्राप्ति कराने (असुरः) जलादि को फेंकनेवाला (सुमृडीकः) सुन्दर सुखकारी (स्ववान्) अपने प्रकाशादि गुणों से युक्त (देवः) प्रकाशक सूर्य्यलोक (यातुधानान्) अन्याय से दूसरों के पदार्थों को धारण करनेवाले (रक्षसः) डाकू, चोर आदि को (अपसेधन्) निवृत्त करता अर्थात् डाकू, चोर आदि सूर्योदय होने पर अपना काम नहीं बना सकते, किन्तु प्रायः रात्रि को ही अपना काम बनाते हैं ओर (प्रतिदोषम्) मनुष्यों के प्रति जो दोष उसको (गृणानः) प्रकट करता हुआ (अस्थात्) उदित होता है, वह (अर्वाङ्) समीपवर्ती पदार्थों को प्राप्त होनेवाला हमारे सुख के अर्थ (यातु) प्राप्त होवे, वैसे तुम होओ॥२६॥
Essence
हे मनुष्यो! मांगनेवालों के लिये उदारता से सुवर्णादि तथा दुष्टाचारियों का तिरस्कार कर और धार्मिक जनों को सुख देके प्रतिदिन सूर्य्य के तुल्य प्रशंसित होओ॥२६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥