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Yajurveda - Mantra 25

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 25

58 Mantra
34/25
Devata- सविता देवता Rishi- आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यपाणिः सवि॒ता विच॑र्षणिरु॒भे द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरी॑यते।अपामी॑वां॒ बाध॑ते॒ वेति॒ सूर्य्य॑म॒भि कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ द्यामृ॑णोति॥२५॥

हिर॑ण्यपाणि॒रिति॒ हिर॑ण्यऽपाणिः। स॒वि॒ता। विच॑र्षणि॒रिति॒ विऽच॑र्षणिः। उ॒भेऽइ॒त्यु॒भे। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒न्तः। ई॒य॒ते॒ ॥ अप॑। अमी॑वाम्। बाध॑ते। वेति। सूर्य्य॑म्। अ॒भि। कृ॒ष्णेन॑। रज॑सा। द्याम्। ऋ॒णो॒ति॒ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवीऽअन्तरीयते । अपामीवाम्बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति ॥

हिरण्यपाणिरिति हिरण्यऽपाणिः। सविता। विचर्षणिरिति विऽचर्षणिः। उभेऽइत्युभे। द्यावापृथिवी इति द्यावापृथिवी। अन्तः। ईयते॥ अप। अमीवाम्। बाधते। वेति। सूर्य्यम्। अभि। कृष्णेन। रजसा। द्याम्। ऋणोति॥२५॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जो (हिरण्यपाणिः) हाथों के तुल्य जलादि के ग्राहक प्रकाशरूप किरणों से युक्त (विचर्षणिः) विशेष कर सबको दिखानेवाली (सविता) सब पदार्थों की उत्पत्ति का हेतु (सूर्य्यम्) सूर्य्यलोक जब (उभे) दोनों (द्यावापृथिवी) आकाश भूमि के (अन्तः) बीच (ईयते) उदय होकर घूमता है, तब (अमीवाम्) व्याधिरूप अन्धकार को (अप, बाधते) दूर करता और जब (वेति) अस्त समय को प्राप्त होता तब (कृष्णेन) (रजसा) काले अन्धकाररूप से (द्याम्) आकाश को (अभि, ऋणोति) सब ओर से व्याप्त होता है, उस सूर्य्य को तुम लोग जानो॥२५॥
Essence
हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य अपने समीपवर्त्ती लोकों का आकर्षण कर धारण करता है, वैसे ही अनेक लोकों से शोभायमान सूर्यादि सब जगत् को सब ओर से व्याप्त हो और आकर्षण करके ईश्वर धारण करता है, ऐसा जानो। क्योंकि ईश्वर के बिना सबका स्रष्टा तथा धर्त्ता अन्य कोई भी नहीं हो सकता॥२५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥