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Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 24

58 Mantra
34/24
Devata- सविता देवता Rishi- आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ष्टौ व्य॑ख्यत् क॒कुभः॑ पृथि॒व्यास्त्री धन्व॒ योज॑ना स॒प्त सिन्धू॑न्।हि॒र॒ण्या॒क्षः स॑वि॒ता दे॒वऽआगा॒द् दध॒द् रत्ना॑ दा॒शुषे॒ वार्य्या॑णि॥२४॥

अ॒ष्टौ। वि। अ॒ख्य॒त्। क॒कुभः॑। पृ॒थि॒व्याः। त्री। धन्व॑। योज॑ना। स॒प्त। सिन्धू॑न् ॥ हि॒र॒ण्या॒क्ष इति॑ हिरण्यऽअ॒क्षः। स॒वि॒ता। दे॒वः। आ। अ॒गा॒त्। दध॑त्। रत्ना॑। दा॒शुषे॑। वार्य्या॑णि ॥२४ ॥

Mantra without Swara
अष्टौ व्यख्यत्ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून् । हिरण्याक्षः सविता देवऽआगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि ॥

अष्टौ। वि। अख्यत्। ककुभः। पृथिव्याः। त्री। धन्व। योजना। सप्त। सिन्धून्॥ हिरण्याक्ष इति हिरण्यऽअक्षः। सविता। देवः। आ। अगात्। दधत्। रत्ना। दाशुषे। वार्य्याणि॥२४॥

Meaning
हे मनुष्यो! जैसे (हिरण्याक्षः) नेत्र के समान रूप दर्शानेवाली ज्योतियों वाला (देवः) प्रेरक (सविता) सूर्य (दाशुषे) दानशील प्राणियों के लिये (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य (रत्ना) पृथिवी के उत्तम पदार्थों को (दधत्) धारण करता हुआ (त्री) तीन (धन्व) अवकाशरूप (योजना) अर्थात् बारह कोस और (सप्त) सात (सिन्धून्) पृथिवी के समुद्र से ले के मेघ के ऊपरले अवयवों पर्यन्त समुद्रों की तथा (पृथिव्याः) पृथिवी सम्बन्धिनी (अष्टौ) आठ (ककुभः) दिशाओं की (वि, अख्यत्) प्रसिद्ध प्रकाशित करता है, वैसे ही तुम लोग होओ॥२४॥
Essence
हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य से पृथिवी तक १२ कोस पर्यन्त हलके भारीपन से युक्त सात प्रकार के जल के अवयव और दिशा विभक्त होती तथा वर्षादि से सबको सुख दिया जाता, वैसे शुभ गुण, कर्म और स्वभावों से दिशाओं में कीर्ति फैला के अनेक प्रकार के ऐश्वर्य को देने से मनुष्यादि प्राणियों को निरन्तर सुखी करो॥२४॥
Subject
अब सूर्य क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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