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Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 23

58 Mantra
34/23
Devata- सोमो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वेन॑ नो॒ मन॑सा देव सोम रा॒यो भा॒गꣳ स॑हसावन्न॒भि यु॑ध्य।मा त्वा त॑न॒दीशि॑षे वी॒र्य्यस्यो॒भये॑भ्यः॒ प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टौ॥२३॥

दे॒वेन॑। नः॒। मन॑सा। दे॒व॒। सो॒म॒। रा॒यः। भा॒गम्। स॒ह॒सा॒व॒न्निति॑ सहसाऽवन्। अ॒भि। यु॒ध्य॒ ॥ मा। त्वा॒। आ। त॒न॒त्। ईशि॑षे। वी॒र्य्य᳖स्य। उ॒भये॑भ्यः। प्र। चि॒कि॒त्स॒। गवि॑ष्टा॒विति॒ गोऽइ॑ष्टौ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
देवेन नो मनसा देव सोम रायो भागँ सहसावन्नभियुध्य । मा त्वा तनदीशिषे वीर्यस्योभयेभ्यः प्र चिकित्सा गविष्टौ ॥

देवेन। नः। मनसा। देव। सोम। रायः। भागम्। सहसावन्निति सहसाऽवन्। अभि। युध्य॥ मा। त्वा। आ। तनत्। ईशिषे। वीर्य्यस्य। उभयेभ्यः। प्र। चिकित्स। गविष्टाविति गोऽइष्टौ॥२३॥

Meaning
हे (सहसावन्) अधिकतर सेनादि बलवाले (सोम) संपूर्ण ऐश्वर्य् के प्रापक (देव) दिव्य गुणों से युक्त राजन्! जो आप (देवेन) उत्तम गुण, कर्म, स्वभावयुक्त (मनसा) मन से (रायः) धन के (भागम्) अंश को (नः) हमारे लिये (अभि, युध्य) सब ओर से प्राप्त कीजिये, जिससे आप (वीर्य्यस्य) वीरकर्म करने को (ईशिषे) समर्थ होते हो, इससे (त्वा) आपको कोई (मा)(आ, तनत्) दबावे सो आप (गविष्टौ) सुख विशेष की इच्छा के होते (उभयेभ्यः) दोनों इस लोक, परलोक के सुखों के लिये (प्र, चिकित्स) रोग निवारण के तुल्य विघ्न निवृत्ति के उपाय को किया कीजिये॥२३॥
Essence
राजादि विद्वानों को चाहिये कि कपटादि दोषों को छोड़ शुद्धभाव से सबके लिये सुख की चाहना करके पराक्रम बढ़ावें और जिस कर्म से दुःख की निवृत्ति तथा सुख की वृद्धि इस लोक, परलोक में हो, उसके करने में निरन्तर प्रयत्न करें॥२३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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