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Yajurveda - Mantra 16

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 16

58 Mantra
34/16
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- नोधा ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र म॑न्महे शवसा॒नाय॑ शू॒षमा॑ङ्गू॒षं गिर्व॑णसेऽअङ्गिर॒स्वत्।सु॒वृ॒क्तिभिः॑ स्तुव॒तऽऋ॑ग्मि॒यायार्चा॑मा॒र्कं नरे॒ विश्रु॑ताय॥१६॥

प्र। म॒न्म॒हे॒। श॒व॒सा॒नाय॑। शू॒षम्। आ॒ङ्गू॒षम्। गिर्व॑णसे। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् ॥ सु॒वृ॒क्तिभि॒रिति॑ सुवृ॒क्तिऽभिः॑ स्तु॒व॒ते। ऋ॑ग्मियाय॑। अर्चा॑म। अ॒र्कम्। नरे॑। विश्रु॑ता॒येति॒ विऽश्रु॑ताय ॥१६ ॥

Mantra without Swara
प्रम्मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषङ्गिर्वणसेऽअङ्गिरस्वत् । सुवृक्तिभि स्तुवतऽऋग्मियायार्चामार्कन्नरे विश्रुताय ॥

प्र। मन्महे। शवसानाय। शूषम्। आङ्गूषम्। गिर्वणसे। अङ्गिरस्वत्॥ सुवृक्तिभिरिति सुवृक्तिऽभिः स्तुवते। ऋग्मियाय। अर्चाम। अर्कम्। नरे। विश्रुतायेति विऽश्रुताय॥१६॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जैसे हम लोग (सुवृक्तिभिः) निर्दोष क्रियाओं से (शवसानाय) विज्ञान के अर्थ (गिर्वणसे) सुशिक्षित वाणियों से युक्त (ऋग्मियाय) ऋचाओं को पढ़नेवाले (विश्रुताय) विशेष कर जिसमें गुण सुने जावें (स्तुवते) शास्त्र के अभिप्रायों को कहने (नरे) नायक मनुष्य के लिये (अङ्गिरस्वत्) प्राण के तुल्य (आङ्गूषम्) विद्याशास्त्र के बोधरूप (शूषम्) बल को (प्र, मन्महे) चाहते हैं और इस (अर्कम्) पूजनीय पुरुष का (अर्चाम) सत्कार करें, वैसे इस विद्वान् के प्रति तुम लोग भी वर्त्तो॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि सत्कार के योग्य का सत्कार और निरादर के योग्य का निरादर करके विद्या और धर्म को निरन्तर बढ़ाया करें॥१६॥
Subject
मनुष्यों को विद्या और धर्म बढ़ाने चाहियें, इस विषय को कहते हैं॥