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Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 14

58 Mantra
34/14
Devata- अग्निर्देवता Rishi- देवश्रवदेववातौ भारतावृषी Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त्ता॒नाया॒मव॑ भरा चिकि॒त्वान्त्स॒द्यः प्रवी॑ता॒ वृष॑णं जजान।अ॒रु॒षस्तू॑पो॒ रुश॑दस्य॒ पाज॒ऽइडा॑यास्पु॒त्रो व॒युने॑ऽजनिष्ट॥१४॥

उ॒त्ता॒नाया॑म्। अव॑। भ॒र॒। चि॒कि॒त्वान्। स॒द्यः। प्रवी॑तेति॒ प्रऽवी॑ता। वृष॑णम्। ज॒जा॒न॒ ॥ अ॒रु॒षस्तू॑प॒ इत्य॑रु॒षऽस्तू॑पः। रुश॑त्। अ॒स्य॒। पाजः॑। इडा॑याः। पु॒त्रः। व॒युने॑। अ॒ज॒नि॒ष्ट॒ ॥१४ ॥

Mantra without Swara
उत्तानायामव भरा चिकित्वान्त्सद्यः प्रवीता वृषणञ्जजान । अरुषस्तूपो रुशदस्य पाजऽइडायास्पुत्रो वयुने जनिष्ट ॥

उत्तानायाम्। अव। भर। चिकित्वान्। सद्यः। प्रवीतेति प्रऽवीता। वृषणम्। जजान॥ अरुषस्तूप इत्यरुषऽस्तूपः। रुशत्। अस्य। पाजः। इडायाः। पुत्रः। वयुने। अजनिष्ट॥१४॥

Meaning
हे विद्वन् पुरुष! आप जैसे (चिकित्वान्) ज्ञानवान् (प्रवीता) कामना करनेहारा विद्वान् जन (उत्तानायाम्) उत्कर्षता के साथ विस्तीर्ण भूमि वा अन्तरिक्ष में (वृषणम्) वर्षा के हेतु यज्ञ को (जजान) प्रकट करता और (अरुषस्तूपः) रक्षक लोगों की उन्नति करनेवाला (इडायाः) प्रशंसित स्त्री का (पुत्रः) पुत्र (वयुने) विज्ञान में (अजनिष्ट) प्रसिद्ध होता (अस्य) इसका (रुशत्) सुन्दर रूपयुक्त (पाजः) बल प्रसिद्ध होता है, वैसे (सद्यः) शीघ्र (अव, भर) अपनी ओर पुष्ट कर॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि मनुष्य इस सृष्टि में ब्रह्मचर्य आदि के सेवन से कन्या-पुत्रों को द्विज करें, तो ये सब शीघ्र विद्वान् हो जावें॥१४॥
Subject
फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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