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Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 13

58 Mantra
34/13
Devata- अग्निर्देवता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरस ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ऽअग्ने॒ तव॑ देव पा॒युभि॑र्म॒घोनो॑ रक्ष त॒न्वश्च वन्द्य।त्रा॒ता तो॒कस्य॒ तन॑ये॒ गवा॑म॒स्यनि॑मेष॒ꣳ रक्ष॑माण॒स्तव॑ व्र॒ते॥१३॥

त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। तव॑। दे॒व॒। पा॒युभि॒रिति॑ पा॒युऽभिः॑। म॒घोनः॑। र॒क्ष॒। त॒न्वः᳖। च॒। व॒न्द्य॒ ॥ त्रा॒ता। तो॒कस्य॑। तन॑ये॒ गवा॑म्। अ॒सि॒। अनि॑मेष॒मित्यनि॑मेषम्। रक्ष॑माणः॒। तव॑। व्र॒ते ॥१३ ॥

Mantra without Swara
त्वन्नोऽअग्ने तवे देव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य । त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेषँ रक्षणस्तव व्रते ॥

त्वम्। नः। अग्ने। तव। देव। पायुभिरिति पायुऽभिः। मघोनः। रक्ष। तन्वः। च। वन्द्य॥ त्राता। तोकस्य। तनये गवाम्। असि। अनिमेषमित्यनिमेषम्। रक्षमाणः। तव। व्रते॥१३॥

Meaning
हे (देव) उत्तम गुणकर्मस्वभावयुक्त (अग्ने) राजन् वा ईश्वर (तव) आप के (व्रते) उत्तम नियम में वर्त्तमान (मघोनः) बहुत धनयुक्त हम लोगों की (तव) आपके (पायुभिः) रक्षादि के हेतु कर्म्मों से (त्वम्) आप (रक्ष) रक्षा कीजिये (च) और (नः) हमारे (तन्वः) शरीरों की रक्षा कीजिये। हे (वन्द्य) स्तुति के योग्य भगवन्! जिस कारण आप (अनिमेषम्) निरन्तर (रक्षमाणः) रक्षा करते हुए (तोकस्य) सन्तान पुत्र (तनये) पौत्र और (गवाम्) गौ आदि के (त्राता) रक्षक (असि) हैं, इसलिये हम लोगों के सर्वदा सत्कार और उपासना के योग्य हैं॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों और आज्ञा की अनुकूलता से वर्तमान हैं, जिनकी ईश्वर और विद्वान् लोग निरन्तर रक्षा करनेवाले हैं, वे लक्ष्मी, दीर्घावस्था और सन्तानों से रहित कभी नहीं होते॥१३॥
Subject
राजा और ईश्वर की कैसी सेवा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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