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Yajurveda - Mantra 9

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 9

97 Mantra
33/9
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ जङ्घनद् द्रविण॒स्युर्वि॑प॒न्यया॑।समि॑द्धः शु॒क्रऽआहु॑तः॥९॥

अ॒ग्निः। वृ॒त्राणि॑। ज॒ङ्घ॒न॒त्। द्र॒वि॒ण॒स्युः। विप॒न्यया॑। समि॑द्ध॒ इति॒ सम्ऽइ॑द्धः। शु॒क्रः। आहु॑त॒ इत्याऽहु॑तः ॥९ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥

अग्निः। वृत्राणि। जङ्घनत्। द्रविणस्युः। विपन्यया। समिद्ध इति सम्ऽइद्धः। शुक्रः। आहुत इत्याऽहुतः॥९॥

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Meaning
हे विद्वन्! जैसे (समिद्धः) सम्यक् प्रदीप्त (शुक्रः) शीघ्रकारी (अग्निः) सूर्य्यादिरूप अग्नि (वृत्राणि) मेघ के अवयवों को (जङ्घनत्) शीघ्र काटता है, वैसे (द्रविणस्युः) अपने धन को चाहनेवाले (आहुतः) बुलाये हुए आप (विपन्यया) विशेष व्यवहार की युक्ति से दुष्टों को शीघ्र मारिये॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे व्यवहार का जाननेवाला पुरुष धन को पाके सत्कार को प्राप्त होकर दोषों को नष्ट करता है, वैसे सूर्य मेघ को ताड़ना देता है॥९॥
Subject
मनुष्य सूर्य के तुल्य दोषों को विनाशे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥