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Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 78

97 Mantra
33/78
Devata- इन्द्रामरुतौ देवते Rishi- अगस्त्य ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब्रह्मा॑णि मे म॒तयः॒ शꣳसु॒तासः॒ शुष्म॑ऽइयर्त्ति॒ प्रभृ॑तो मे॒ऽअद्रिः॑।आ शा॑सते॒ प्रति॑ हर्य्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ऽअच्छ॑॥७८॥

ब्रह्मा॑णि। मे॒। म॒तयः॑। शम्। सु॒तासः॑। शुष्मः॑। इ॒य॒र्त्ति॒। प्रभृ॑त॒ इति॒ प्रभृ॑तः। मे॒। अद्रिः॑ ॥ आ। शा॒स॒ते॒। प्रति॑। ह॒र्य्य॒न्ति॒। उ॒क्था। इ॒मा। हरी॒ऽइति॒ हरी॑। व॒ह॒तः॒। ता। नः॒। अच्छ॑ ॥७८ ॥

Mantra without Swara
ब्रह्माणि मे मतयः शँ सुतासः शुष्मऽइयर्ति प्रभृतो मेऽअद्रिः । आ शासते प्रतिहर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नोऽअच्छ ॥

ब्रह्माणि। मे। मतयः। शम्। सुतासः। शुष्मः। इयर्त्ति। प्रभृत इति प्रभृतः। मे। अद्रिः॥ आ। शासते। प्रति। हर्य्यन्ति। उक्था। इमा। हरीऽइति हरी। वहतः। ता। नः। अच्छ॥७८॥

Meaning
(सुतासः) विद्या और सुन्दर शिक्षा से युक्त ऐश्वर्यवाले (मतयः) बुद्धिमान् लोग (मे) मेरे लिये जिन (ब्रह्माणि) धनों की (प्रति, हर्यन्ति) प्रतीति से कामना करते और (इमा) इन (उक्था) प्रशंसा के योग्य वेदवचनों की (आ, शासते) अभिलाषा करते हैं और (शुष्मः) बलकारी (प्रभृतः) अच्छे प्रकार हवनादि से पुष्ट किया (अद्रिः) मेघ (मे) मेरे लिये जिस (शम्) सुख को (इयर्त्ति) पहुंचाता (ता) उनको (नः) हमारे लिये (हरी) हरणशील अध्यापक और अध्येता (अच्छा, वहतः) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं॥७८॥
Essence
हे विद्वानों! जिस कर्म से विद्या और मेघ की उन्नति हो उसकी क्रिया करो। जो लोग तुमसे विद्या और सुशिक्षा चाहते हैं, उनको प्रीति से देओ और जो आपसे अधिक विद्यावाले हों, उनसे तुम विद्या ग्रहण करो॥७८॥
Subject
फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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