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Yajurveda - Mantra 75

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 75

97 Mantra
33/75
Devata- विद्वान् देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ रोद॑सीऽअपृण॒दा स्व॑र्म॒हज्जा॒तं यदे॑नम॒पसो॒ऽअधा॑रयन्।सोऽअ॑ध्व॒राय॒ परि॑ णीयते क॒विरत्यो॒ न वाज॑सातये॒ चनो॑हितः॥७५॥

आ। रोद॑सी॒ऽइति॒ रोद॑सी। अ॒पृ॒ण॒त्। आ। स्वः॑। म॒हत्। जा॒तम्। यत्। ए॒न॒म्। अ॒पसः॑। अधा॑रयन् ॥ सः। अ॒ध्व॒राय॑। परि॑। नी॒य॒ते॒। क॒विः। अत्यः॑। न। वाज॑सातये॒ऽइति॒ वाज॑ऽसातये। चनो॑हित॒ऽइति॒ चनः॑ऽहितः ॥७५ ॥

Mantra without Swara
आ रोदसीऽअपृणदा स्वर्महज्जातन्यदेनमपसोऽअधारयन् । सोऽअध्वराय परिणीयते कविरत्यो न वाजसातये चनोहितः ॥

आ। रोदसीऽइति रोदसी। अपृणत्। आ। स्वः। महत्। जातम्। यत्। एनम्। अपसः। अधारयन्॥ सः। अध्वराय। परि। नीयते। कविः। अत्यः। न। वाजसातयेऽइति वाजऽसातये। चनोहितऽइति चनःऽहितः॥७५॥

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Meaning
हे मनुष्यो! (यत्) जो विद्युत् रूप अग्नि (रोदसी) सूर्य-पृथिवी और (महत्) महान् (जातम्) प्रसिद्ध (स्वः) अन्तरिक्ष को (आ, अपृणत्) अच्छे प्रकार व्याप्त होता (एनम्) इस अग्नि को (अपसः) कर्म (आ, अधारयन्) अच्छे प्रकार धारण करते तथा जो (कविः) शब्द होने का हेतु अग्नि (अध्वराय) अहिंसा नामक शिल्पविद्या रूप यज्ञ के तथा (वाजसातये) वेग के सम्यक् सेवन के लिये (अत्यः) मार्ग को व्याप्त होनेवाले घोड़े के (नः) समान विद्वानों ने (परि, नीयते) प्राप्त किया है, (सः) वह (चनोहितः) पृथिवी आदि अन्न के लिये हितकारी है, ऐसा तुम लोग जानो॥७५॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि अनेक प्रकार के विज्ञान और कर्मों से बिजुली रूप अग्नि की विद्या को प्राप्त हो, भूमि आदि में व्याप्त विभागकर्ता साधन किया हुआ यान आदि को शीघ्र पहँुचानेवाले अग्नि को कार्यों में उपयुक्त करें॥७५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥