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Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 54

97 Mantra
33/54
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वेभ्यो॒ हि प्र॑थ॒मं य॒ज्ञिये॑भ्योऽमृत॒त्वꣳ सु॒वसि॑ भा॒गमु॑त्त॒मम्।आदिद् दा॒मान॑ꣳ सवित॒र्व्यूड्टर्णुषेऽनूची॒ना जी॑वि॒ता मानु॑षेभ्यः॥५४॥

दे॒वेभ्यः॑। हि। प्र॒थ॒मम्। य॒ज्ञिये॑भ्यः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। सु॒वसि॑। भा॒गम्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥ आत्। इत्। दा॒मान॑म्। स॒वि॒तः॒। वि। ऊ॒र्णु॒षे॒। अ॒नू॒ची॒ना। जी॒वि॒ता। मानु॑षेभ्यः ॥५४ ॥

Mantra without Swara
देवेभ्यो हि प्रथमँयज्ञियेभ्यो मृतत्वँ सुवसि भागमुत्तमम् । आदिद्दामानँ सवितर्व्यूर्णुषे नूचीना जीविता मानुषेभ्यः ॥

देवेभ्यः। हि। प्रथमम्। यज्ञियेभ्यः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। सुवसि। भागम्। उत्तममित्युत्ऽतमम्॥ आत्। इत्। दामानम्। सवितः। वि। ऊर्णुषे। अनूचीना। जीविता। मानुषेभ्यः॥५४॥

Meaning
हे (सवितः) समस्त जगत् के उत्पादक जगदीश्वर! (हि) जिससे आप (यज्ञियेभ्यः) यज्ञसिद्धि करनेहारे (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (उत्तमम्) श्रेष्ठ (प्रथमम्) मुख्य (अमृतत्वम्) मोक्षभाव (भागम्) सेवने योग्य सुख को (सुवसि) प्रेरित करते हो (आत्, इत्) इसके अनन्तर ही (दामानम्) सुख देनेवाले प्रकाश और (अनूचीना) जानने के साधन (जीविता) जीवन के हेतु कर्मों को (मानुषेभ्यः) मनुष्यों के लिये (वि, ऊर्णुषे) विस्तृत करते हो, इसलिये उपासना के योग्य हो॥५४॥
Essence
हे मनुष्यो! परमेश्वर ही के योग और विद्वानों के सङ्ग से सर्वोत्तम सुखवाले मोक्ष को प्राप्त होओ॥५४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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