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Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 32

97 Mantra
33/32
Devata- सूर्यो देवता Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒णयन्तं॒ जनाँ॒२ऽअनु॑।त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि॥३२॥

येन॑। पा॒व॒क॒। चक्ष॑सा। भु॒र॒ण्यन्त॑म्। जना॑न्। अनु॑ ॥ त्वम्। व॒रु॒॒ण॒। पश्य॑सि ॥३२ ॥

Mantra without Swara
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तञ्जनाँऽअनु । त्वँवरुण पश्यसि ॥

येन। पावक। चक्षसा। भुरण्यन्तम्। जनान्। अनु॥ त्वम्। वरुण। पश्यसि॥३२॥

Meaning
हे (पावक) पवित्रकर्त्ता (वरुण) श्रेष्ठ विद्वन् वा राजन्! (त्वम्) आप (येन) जिस (चक्षसा) प्रकट दृष्टि वा उपदेश से (भुरण्यन्तम्) रक्षा करते हुए (अनु, पश्यसि) अनुकूल देखते हो, उससे (जनान्) हम आदि मनुष्यों को देखिये और आपके अनुकूल हम वर्त्तें॥३२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा और राजपुरुष जिस प्रकार के व्यवहार से प्रजाओं में वर्त्तें, वैसे ही भाव से इनमें प्रजा लोग भी वर्त्तें॥३२॥
Subject
फिर राजधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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