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Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 31

97 Mantra
33/31
Devata- सूर्यो देवता Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑।दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य्य॑म्॥३१॥

उँ॒ऽइत्युँ॑त्। उ। त्यम्। जा॒तवे॑दस॒मिति॑ जा॒तऽवे॑दसम्। दे॒वम्। व॒ह॒न्ति॒। के॒तवः॑ ॥ दृ॒शे। विश्वा॑य। सूर्य्य॑म् ॥३१ ॥

Mantra without Swara
उदु त्यञ्जातवेदसन्देवँ वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥

उँऽइत्युँत्। उ। त्यम्। जातवेदसमिति जातऽवेदसम्। देवम्। वहन्ति। केतवः॥ दृशे। विश्वाय। सूर्य्यम्॥३१॥

Meaning
हे मनुष्यो! जिस (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (देवम्) चिलचिलाते हुए (सूर्य्यम्) सूर्य्यमण्डल को (विश्वाय) संसार को (दृशे) देखने के लिये (केतवः) किरणें (उत्, वहन्ति) ऊपर को आश्चर्यरूप प्राप्त करती हैं (त्यम्) उस (उ) ही को तुम लोग जानो॥३१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य किरणों से संसार को दिखाता और आप सुशोभित होता, वैसे विद्वान् लोग सब विद्या और शिक्षाओं को दिखाकर सुन्दर शोभायमान हों॥३१॥
Subject
अब सूर्यमण्डल कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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