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Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 26

97 Mantra
33/26
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इन्द्रो॑ वृ॒त्रम॑वृणो॒च्छर्द्ध॑नीतिः॒ प्र मा॒यिना॑ममिना॒द्वर्प॑णीतिः।अह॒न् व्यꣳसमु॒शध॒ग्वने॑ष्वा॒विर्धेना॑ऽअकृणोद्रा॒म्याणा॑म्॥२६॥

इन्द्रः॑। वृ॒त्रम्। अ॒वृ॒णो॒त्। शर्द्ध॑नीति॒रिति॒ शर्द्ध॑ऽनीतिः। प्र। मा॒यिना॑म्। अ॒मि॒ना॒त्। वर्प॑णीतिः। वर्प॑नीति॒रिति॒ वर्प॑ऽनीतिः ॥ अह॑न्। व्य॑ꣳस॒मिति॒ विऽअ॑ꣳसम्। उ॒शध॑क्। वने॑षु। आ॒विः। धेनाः॑ अ॒कृ॒णो॒त्। रा॒म्याणा॑म् ॥२६ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनाद्वर्पणीतिः । अहन्व्यँसमुशधग्वनेष्वाविर्धेनाऽअकृणोद्राम्याणाम् ॥

इन्द्रः। वृत्रम्। अवृणोत्। शर्द्धनीतिरिति शर्द्धऽनीतिः। प्र। मायिनाम्। अमिनात्। वर्पणीतिः। वर्पनीतिरिति वर्पऽनीतिः॥ अहन्। व्यꣳसमिति विऽअꣳसम्। उशधक्। वनेषु। आविः। धेनाः अकृणोत्। राम्याणाम्॥२६॥

Meaning
(शर्द्धनीतिः) बल को प्राप्त (वर्पणीतिः) नाना प्रकार के रूपोंवाला (उशधक्) पर पदार्थों को चाहनेवाला चोरादि को नष्ट करनेहारा (इन्द्रः) सूर्य्य के तुल्य प्रतापी सभापति (वृत्रम्) प्रकाश को रोकनेहारे मेघ के तुल्य धर्म के निरोधक दुष्ट शत्रु को (अवृणोत्) युद्ध के लिये स्वीकार करे, (मायिनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले छली-कपटी आदि को (प्र, अमिनात्) मारे, जो (वनेषु) वनों में रहनेवाले (व्यंसम्) कपटी हैं भुजा जिसकी, ऐसे चोर को (अहन्) मारे और (राम्याणाम्) आनन्द देनेवाले उपदेशकों की (धेनाः) वाणियों को (आविः, अकृणोत्) प्रकट करे, वही राजा होने को योग्य है॥२६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के तुल्य सुशिक्षित वाणियों को प्रकट करते, जैसे अग्नि वनों को वैसे दुष्ट शत्रुओं को मारते, दिन जैसे रात्रि को निवृत्त करे वैसे छल, कपटता और अविद्यारूप अन्धकारादि को निवृत्त करते और बल को प्रकट करते हैं, वे अच्छे प्रतिष्ठित राजपुरुष होते हैं॥२६॥
Subject
राजपुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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