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Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 25

97 Mantra
33/25
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रेहि॒ मत्स्यन्ध॑सो॒ विश्वे॑भिः सोम॒पर्व॑भिः।म॒हाँ२ऽअ॑भि॒ष्टिरोज॑सा॥२५॥

इन्द्र॑। आ। इ॒हि॒। म॑त्सि। अन्ध॑सः। विश्वे॑भिः। सो॒म॒पर्व॑भि॒रिति॑ सोम॒पर्व॑ऽभिः ॥ म॒हान्। अ॒भि॒ष्टिः। ओज॑सा ॥२५ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः । महाँऽअभिष्टिरोजसा ॥

इन्द्र। आ। इहि। मत्सि। अन्धसः। विश्वेभिः। सोमपर्वभिरिति सोमपर्वऽभिः॥ महान्। अभिष्टिः। ओजसा॥२५॥

Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य देनेवाले विद्वन्! जिस कारण आप (ओजसा) पराक्रम के साथ (महान्) बड़े (अभिष्टिः) सब ओर से सत्कार के योग्य (विश्वेभिः) सब (सोमपर्वभिः) सोमादि ओषधियों के अवयवों और (अन्धसः) अन्न से (मत्सि) तृप्त होते हो, इससे हमको (आ, इहि) प्राप्त हूजिये॥२५॥
Essence
हे मनुष्यो! जिस कारण अन्न आदि से मनुष्यादि प्राणियों के शरीरादि का निर्वाह होता है, इससे इनके वृद्धि, सेवन, आहार और विहार यथावत् जानो॥२५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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