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Yajurveda - Mantra 2

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 2

97 Mantra
33/2
Devata- अग्नयो देवताः Rishi- विश्वरूप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हर॑यो धू॒मके॑तवो॒ वात॑जूता॒ऽउप॒ द्यवि॑।यत॑न्ते॒ वृथ॑ग॒ग्नयः॑॥२॥

हर॑यः। धू॒मके॑तव॒ इति॑ धू॒मऽके॑तवः। वात॑जूता॒ इति वात॑ऽजूताः। उप॑। द्यवि॑ ॥ यत॑न्ते। वृथ॑क्। अ॒ग्नयः॑ ॥२ ॥

Mantra without Swara
हरयो धुमकेतवो वातजूताऽउप द्यवि । यतन्ते वृथगग्नयः ॥

हरयः। धूमकेतव इति धूमऽकेतवः। वातजूता इति वातऽजूताः। उप। द्यवि॥ यतन्ते। वृथक्। अग्नयः॥२॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जो (धूमकेतवः) जिनका जतानेवाला धूम ही पताका के तुल्य है (वाताजूताः) वायु से तेज को प्राप्त हुए ((हरयः) हरणशील (अग्नयः) पावक (वृथक्) नाना प्रकार से (द्यवि) प्रकाश के निमित्त (उप, यतन्ते) यत्न करते हैं, उनको कार्य्यसिद्धि के अर्थ उपयोग में लाओ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो! जिनका धूम ज्ञान कराने और वायु जलानेवाला है और जिनमें हरणशीलता वर्त्तमान है, वे अग्नि हैं, ऐसा जानो॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥