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Yajurveda - Mantra 48

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 48

60 Mantra
29/48
Devata- वीरा देवताः Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒प॒र्णं व॑स्ते मृ॒गोऽअ॑स्या॒ दन्तो॒ गोभिः॒ सन्न॑द्धा पतति॒ प्रसू॑ता। यत्रा॒ नरः॒ सं च॒ वि च॒ द्रव॑न्ति॒ तत्रा॒स्माभ्य॒मिष॑वः॒ शर्म॑ यꣳसन्॥४८॥

सु॒प॒र्णमिति॑ सुऽप॒र्णम्। व॒स्ते॒। मृ॒गः। अ॒स्याः॒। दन्तः॑। गोभिः॑। सन्न॒द्धेति सम्ऽन॑द्धा। प॒त॒ति॒। प्रसू॒तेति॒ प्रऽसू॑ता। यत्र॒। नरः॑। सम्। च॒। वि। च॒। द्रव॑न्ति। तत्र॑। अ॒स्मभ्य॑म्। इष॑वः। शर्म॑। य॒ꣳस॒न् ॥४८ ॥

Mantra without Swara
सुपर्णँ वस्ते मृगोऽअस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता । यत्रा नरः सञ्च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यँसन् ॥

सुपर्णमिति सुऽपर्णम्। वस्ते। मृगः। अस्याः। दन्तः। गोभिः। सन्नद्धेति सम्ऽनद्धा। पतति। प्रसूतेति प्रऽसूता। यत्र। नरः। सम्। च। वि। च। द्रवन्ति। तत्र। अस्मभ्यम्। इषवः। शर्म। यꣳसन्॥४८॥

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Meaning
हे वीर पुरुषो! (यत्र) जिस सेना में (नरः) नायक लोग हों जो (सुपर्णम्) सुन्दर पूर्ण रक्षा के साधन उस रथादि को (वस्ते) धारण करती और जहां (गोभिः) गौओं के सहित (दन्तः) जिस का दमन किया जाता, उस (मृगः) कस्तूरी से शुद्ध करने वाले मृग के तुल्य (इषवः) बाण आदि शस्त्र विशेष चलते हैं, जो (सन्नद्धा) सम्यक् गोष्ठी बंधी (प्रसूता) प्रेरणा की हुई शत्रुओं में (पतति) गिरती (च) और इधर-उधर (अस्याः) इस सेना के वीर पुरुष (सम्, द्रवन्ति) सम्यक् चलते (च) और (वि) विशेषकर दौड़ते हैं (तत्र) उस सेवा में (अस्मभ्यम्) हमारे लिए आप लोग (शर्म) सुख (यंसन्) देओ॥४८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! तुम लोगों को चाहिए कि शत्रुओं से न धमकने वाली हृष्ट-पुष्ट सेना सिद्ध करो, उसमें सुन्दर परीक्षित योद्धा और अध्यक्ष रक्खो, उन शस्त्र-अस्त्रों के चलाने में कुशल जनों से विजय को प्राप्त होओ॥४८॥
Subject
फिर राजधर्म अगले मन्त्र में कहते हैं।