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Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 25

46 Mantra
28/25
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- सरस्वत्यृषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
होता॑ यक्ष॒त्तनू॒नपा॑तमु॒द्भिदं॒ यं गर्भ॒मदि॑तिर्द॒धे शुचि॒मिन्द्रं॑ वयो॒धस॑म्।उ॒ष्णिहं॒ छन्द॑ऽ इन्द्रि॒यं दि॑त्य॒वाहं॒ गां वयो॒ दध॒द्वेत्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥२५॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। तनू॒नपा॑त॒मिति॒ तनू॒ऽनपा॑तम्। उ॒द्भिद॒मित्यु॒त्ऽभिद॑म्। यम्। गर्भ॑म्। अदि॑तिः। द॒धे। शुचि॑म्। इन्द्र॑म्। व॒यो॒धस॒मिति॑ वयः॒धस॑म्। उ॒ष्णिह॑म्। छन्दः॑। इ॒न्द्रि॒यम्। दि॒त्य॒वाह॒मिति॑ दित्य॒ऽवाह॑म्। गाम्। वयः॑। दध॑त्। वेतु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षत्तनूनपातमुद्भिदँयङ्गर्भमदितिर्दधे शुचिमिन्द्रँवयोधसम् । उष्णिहञ्छन्दऽइन्द्रियन्दित्यवाहङ्गाँवयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। तनूनपातमिति तनूऽनपातम्। उद्भिदमित्युत्ऽभिदम्। यम्। गर्भम्। अदितिः। दधे। शुचिम्। इन्द्रम्। वयोधसमिति वयःधसम्। उष्णिहम्। छन्दः। इन्द्रियम्। दित्यवाहमिति दित्यऽवाहम्। गाम्। वयः। दधत्। वेतु। आज्यस्य। होतः। यज॥२५॥

Meaning
हे (होतः) ज्ञान के यज्ञ के कर्त्तः! जैसे (होता) शुभ गुणों का ग्रहण करने वाला जन (तनूनपातम्) शरीरादि के रक्षक (उद्भिदम्) शरीर का भेदन कर निकलने वाले (गर्भम्) गर्भ को जैसे (अदितिः) माता धारण करती, वैसे (यम्) जिस को (दधे) धारण करता है, (वयोधसम्) अवस्था के वर्धक (शुचिम्) पवित्र (इन्द्रम्) सूर्य्य को (यक्षत्) हवन का पदार्थ पहुंचाता है, (आज्यस्य) विज्ञानसम्बन्धी (उष्णिहम्) उष्णिक् छन्द से कहे हुए (छन्दः) बलकारी (इन्द्रियम्) जीव के श्रोत्रादि चिह्नों और (दित्यवाहम्) खण्डितों को पहुंचाने वाले (गाम्) वाणी और (वयः) सुन्दर-सुन्दर पक्षियों को (दधत्) धारण करता हुआ (वेतु) प्राप्त होवे, वैसे इन सब को आप (यज) संगत कीजिये॥२५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग जैसे माता गर्भ और उत्पन्न हुए बालक की रक्षा करती है, वैसे शरीर और इन्द्रियों की रक्षा करके विद्या और आयुर्दा को बढ़ाओ॥२५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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