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Yajurveda - Mantra 24

Yajurveda Adhyay 28 / Mantra 24

46 Mantra
28/24
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सरस्वती ऋषिः Chhand- स्वराड् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
होता॑ यक्षत्समिधा॒नं म॒हद्यशः॒ सुस॑मिद्धं॒ वरे॑ण्यम॒ग्निमिन्द्रं॑ वयो॒धस॑म्।गा॒य॒त्रीं छन्द॑ऽइन्द्रि॒यं त्र्यविं॒ गां वयो॒ दध॒द् वेत्वाज्य॑स्य होत॒र्यज॑॥२४॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। स॒मि॒धा॒नमिति॑ सम्ऽइधा॒नम्। म॒हत्। यशः॑। सुस॑मिद्ध॒मिति॒ सुऽस॑मिद्धम्। वरे॑ण्यम्। अ॒ग्निम्। इन्द्र॑म्। व॒यो॒धस॒मिति॑ वयः॒ऽधस॑म्। गा॒य॒त्रीम्। छन्दः॑। इ॒न्द्रि॒यम्। त्र्यवि॒मिति॑ त्रि॒ऽअवि॑म्। गाम्। वयः॑। दध॑त्। वेतु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥२४ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षत्समिधानम्महद्यशः सुसमिद्धँवरेण्यमग्निमिन्द्रँवयोधसम् । गायत्रीञ्छन्दऽइन्द्रियन्त्र्यविङ्गाँवयो दधद्वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। समिधानमिति समऽइधानम्। महत्। यशः। सुसमिद्धमिति सुऽसमिद्धम्। वरेण्यम्। अग्निम्। इन्द्रम्। वयोधसमिति वयःऽधसम्। गायत्रीम्। छन्दः। इन्द्रियम्। त्र्यविमिति त्रिऽअविम्। गाम्। वयः। दधत्। वेतु। आज्यस्य। होतः। यज॥२४॥

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Meaning
हे (होतः) विद्यादि का ग्रहण करने हारे जन! आप जैसे (होता) दाता पुरुष (अग्निम्) अग्नि के तुल्य (समिधानम्) सम्यक् प्रकाशमान (सुसमिद्धम्) सुन्दर शोभायमान (वरेण्यम्) ग्रहण करने योग्य (महत्) बड़ा (यशः) कीर्त्ति (वयोधसम्) अभीष्ट अवस्था के धारक (इन्द्रम्) उत्तम ऐश्वर्य करने वाले योग (गायत्रीम्) सत्य अर्थों का प्रकाश करने वाली गायत्री (छन्दः) स्वतन्त्रता (इन्द्रियम्) धन वा श्रोत्रादि इन्द्रियों (त्र्यविम्) तीन प्रकार से रक्षा करने वाली (गाम्) पृथिवी और (वयः) जीवन को (दधत्) धारण करता हुआ (यक्षत्) सङ्ग करे और (आज्यस्य) विज्ञान के रस को (वेतु) प्राप्त होवे, वैसे आप भी (यज) समागम कीजिये॥२४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष सत् विद्या आदि पदार्थों का दान करते हैं, वे अतुल कीर्ति को पाकर आप सुखी होते और दूसरों को सुखी करते हैं॥२४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥