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Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 30

45 Mantra
27/30
Devata- वायुर्देवता Rishi- पुरुमीढ ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वायो॑ शु॒क्रोऽ अ॑यामि ते॒ मध्वो॒ऽअग्रं॒ दिवि॑ष्टिषु। आ या॑हि॒ सोम॑पीतये स्पा॒र्हो दे॑व नि॒युत्व॑ता॥३०॥

वायो॒ऽइति॒ वायो॑। शु॒क्रः। अ॒या॒मि॒। ते॒। मध्वः॑। अग्र॑म्। दिवि॑ष्टिषु। आ। या॒हि॒। सोम॑ऽपीतय॒ इति॒ सोम॑पीतये। स्पा॒र्हः। दे॒व॒। नि॒युत्व॑ता ॥३० ॥

Mantra without Swara
वायो शुक्रोऽअयामि ते मध्वोऽअग्रंदिविष्टिषु । आ याहि सोमपीतये स्पार्हा देव नियुत्वता ॥

वायोऽइति वायो। शुक्रः। अयामि। ते। मध्वः। अग्रम्। दिविष्टिषु। आ। याहि। सोमऽपीतय इति सोमपीतये। स्पार्हः। देव। नियुत्वता॥३०॥

Meaning
हे (वायो) जो वायु के समान वर्त्तमान विद्वन्! (शुक्रः) शुद्धिकारक आप हैं, (ते) आप के (मध्वः) मधुर वचन के (अग्रम्) उत्तम भाग को (दिविष्टिषु) उत्तम सङ्गतियों में मैं (अयामि) प्राप्त होता हूँ। हे (देव) उत्तम गुणयुक्त विद्वान् पुरुष! (स्पार्हः) उत्तम गुणों की अभिलाषा से युक्त के पुत्र आप (नियुत्वता) वायु के साथ (सोमपीतये) उत्तम ओषधियों का रस पीने के लिये (आ, याहि) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये॥३०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे वायु सब रस और गन्ध आदि को पीके सब को पुष्ट करता है, वैसे तू भी सब को पुष्ट किया कर॥३०॥
Subject
फिर मनुष्य को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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