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Yajurveda - Mantra 1

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 1

45 Mantra
27/1
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अग्निर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समा॑स्त्वाऽग्न ऋ॒तवो॑ वर्द्धयन्तु संवत्स॒राऽऋष॑यो॒ यानि॑ स॒त्या। सं दि॒व्येन॑ दीदिहि रोच॒नेन॒ विश्वा॒ऽ आ भा॑हि प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः॥१॥

समाः॑। त्वा॒। अ॒ग्ने॒। ऋ॒तवः॑। व॒र्द्घ॒य॒न्तु। सं॒व॒त्स॒राः। ऋष॑यः। यानि॑। स॒त्या। सम्। दि॒व्येन॑। दी॒दि॒हि॒। रो॒च॒नेन॑। विश्वाः॑। आ। भा॒हि॒। प्र॒दिश॒ इति॑ प्र॒ऽदिशः॑। चत॑स्रः ॥१ ॥

Mantra without Swara
सास्त्वाग्नऽऋतवो वर्धयन्तु सँवत्सराऽऋषयो यानि सत्या । सन्दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वाऽआभाहि प्रदिशश्चतस्रः ॥

समाः। त्वा। अग्ने। ऋतवः। वर्द्घयन्तु। संवत्सराः। ऋषयः। यानि। सत्या। सम्। दिव्येन। दीदिहि। रोचनेन। विश्वाः। आ। भाहि। प्रदिश इति प्रऽदिशः। चतस्रः॥१॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन्! (समाः) वर्ष (ऋतवः) शरद् आदि ऋतु (संवत्सराः) प्रभवादि संवत्सर (ऋषयः) मन्त्रों के अर्थ जानने वाले विद्वान् और (यानि) जो (सत्या) कर्म हैं, वे (त्वा) आप को (वर्द्धयन्तु) बढ़ावें, जैसे अग्नि (दिव्येन) शुद्ध (रोचनेन) प्रकाश से (विश्वाः) सब (प्रदिशः) उत्तम गुणयुक्त (चतस्रः) चार दिशाओं को प्रकाशित करता है, वैसे विद्या की (सं, दीदिहि) सुन्दर प्रकार कामना कीजिये और न्याययुक्त धर्म का (आ, भाहि) अच्छे प्रकार प्रकाश कीजिये॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। आप्तपुरुषों को चाहिये कि सब काल में सत्य विद्या और उत्तम कामों का उपेदश करके सब शरीरधारियों के आरोग्य, पुष्टि, विद्या और सुशीलता को बढ़ावें, जैसे सूर्य अपने सन्मुख के पदार्थों को प्रकाशित करता है, वैसे सब मनुष्यों को शिक्षा से सदैव आनन्दित किया करें॥१॥
Subject
अब सत्ताईसवें अध्याय का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में आप्तों को कैसा आचरण करना चाहिये, इस विषय को कहा है॥