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Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 8

48 Mantra
25/8
Devata- इन्द्रादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदभिकृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य क्रो॒डोऽदि॑त्यै पाज॒स्यं दि॒शां ज॒त्रवोऽदि॑त्यै भ॒सज्जी॒मूता॑न् हृदयौप॒शेना॒न्तरि॑क्षं पुरी॒तता॒ नभ॑ऽउद॒र्येण चक्रवा॒कौ मत॑स्नाभ्यां॒ दिवं॑ वृ॒क्काभ्यां॑ गि॒रीन् प्ला॒शिभि॒रुप॑लान् प्ली॒ह्ना व॒ल्मीका॑न् क्लो॒मभि॑र्ग्लौ॒भिर्गुल्मा॑न् हि॒राभिः॒ स्रव॑न्तीर्ह्र॒दान् कु॒क्षिभ्या॑ समु॒द्रमु॒दरे॑ण वैश्वान॒रं भस्म॑ना॥८॥

इन्द्र॑स्य। क्रो॒डः। अदि॑त्यै। पा॒ज॒स्य᳖म्। दि॒शाम्। ज॒त्रवः॑। अदि॑त्यै। भ॒सत्। जी॒मूता॑न्। हृ॒द॒यौ॒प॒शेन॑। अ॒न्तरि॑क्षम्। पु॒री॒तता॑। पु॒रि॒ततेति॑ पुरि॒ऽतता॑। नभः॑। उ॒द॒र्ये᳖ण। च॒क्र॒वा॒काविति॑ चक्रऽवा॒कौ। मत॑स्नाभ्याम्। दिव॑म्। वृ॒क्काभ्या॑म्। गि॒रीन्। प्ला॒शिभि॒रिति॑ प्ला॒शिऽभिः॑। उप॑लान्। प्ली॒ह्ना। व॒ल्मीका॑न्। क्लो॒मभि॒रिति॑ क्लो॒मऽभिः॑। ग्लौ॒भिः। गुल्मा॑न्। हि॒राभिः॑। स्रव॑न्तीः। ह्न॒दान्। कु॒क्षिभ्या॒मिति॑ कु॒क्षिऽभ्या॑म्। स॒मु॒द्रम्। उ॒दरे॑ण। वै॒श्वा॒न॒रम्। भस्म॑ना ॥८ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य क्रीडोदित्यै पाजस्यन्दिशाञ्जत्रवोदित्यै भसज्जीमूतान्हृदयौपशेनान्तरिक्षम्पुरीतता नभऽउदर्येण चक्रवाकौ मतस्नाभ्यान्दिवँवृक्काभ्याङ्गिरीन्प्लाशिभिरुपलान्प्लीह्ना वल्मीकान्क्लोमभिर्ग्लाभिर्गुल्मान्हिराभिः स्रवन्तीह््र्रदान्कुक्षिभ्याँ समुद्रमुदरेण वैश्वानरम्भस्मना ॥

इन्द्रस्य। क्रोडः। अदित्यै। पाजस्यम्। दिशाम्। जत्रवः। अदित्यै। भसत्। जीमूतान्। हृदयौपशेन। अन्तरिक्षम्। पुरीतता। पुरिततेति पुरिऽतता। नभः। उदर्येण। चक्रवाकाविति चक्रऽवाकौ। मतस्नाभ्याम्। दिवम्। वृक्काभ्याम्। गिरीन्। प्लाशिभिरिति प्लाशिऽभिः। उपलान्। प्लीह्ना। वल्मीकान्। क्लोमभिरिति क्लोमऽभिः। ग्लौभिः। गुल्मान्। हिराभिः। स्रवन्तीः। ह्नदान्। कुक्षिभ्यामिति कुक्षिऽभ्याम्। समुद्रम्। उदरेण। वैश्वानरम्। भस्मना॥८॥

Meaning
हे मनुष्यो! तुम को उत्तम यत्न के साथ (इन्द्रस्य) बिजुली का (क्रोडः) डूबना (अदित्यै) पृथिवी के लिये (पाजस्यम्) अन्नों में जो उत्तम वह (दिशाम्) दिशाओं की (जत्रवः) सन्धि अर्थात् उनका एक-दूसरे से मिलना (अदित्यै) अखण्डित प्रकाश के लिये (भसत्) लपट ये सब पदार्थ जानने चाहियें तथा (जीमूतान्) मेघों को (हृदयौपशेन) जो हृदय में सोता है, उस जीव से (पुरीतता) हृदयस्थ नाड़ी से (अन्तरिक्षम्) हृदय के अवकाश को (उदर्येण) उदर में होते हुए व्यवहार से (नभः) जल और (चक्रवाकौ) चकई-चकवा पक्षियों के समान जो पदार्थ उन को (मतस्नाभ्याम्) गले के दोनों ओर के भागों से (दिवम्) प्रकाश को (वृक्काभ्याम्) जिन क्रियाओं से अवगुणों का त्याग होता है, उनसे (गिरीन्) पर्वतों को (प्लाशिभिः) उत्तम भोजन आदि क्रियाओं से (उपलान्) दूसरे प्रकार के मेघों को (प्लीह्ना) हृदयस्थ प्लीहा अङ्ग से (वल्मीकान्) मार्गों को (क्लोमभिः) गीलेपन और (ग्लौभिः) हर्ष तथा ग्लानियों से (गुल्मान्) दाहिनी ओर उदर में स्थित जो पदार्थ उनको (हिराभिः) बढ़तियों से (स्रवन्तीः) नदियों को (ह्रदान्) छोटे-बड़े जलाशयों को (कुक्षिभ्याम्) कोखों से (समुद्रम्) अच्छे प्रकार जहां जल जाता उस समुद्र को (उदरेण) पेट और (भस्मना) जले हुए पदार्थ का जो शेषभाग उस राख से (वैश्वानरम्) सब के प्रकाश करने हारे अग्नि को तुम लोग जानो॥८॥
Essence
जो मनुष्य अनेक विद्याबोधों को प्राप्त होकर ठीक-ठीक यथोचित आहार और विहारों से सब अङ्गों को अच्छे प्रकार पुष्ट कर रोगों की निवृत्ति करें तो वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को अच्छे प्रकार प्राप्त होवें॥८॥
Subject
फिर किस-किस के गुण पशुओं में हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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