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Yajurveda - Mantra 33

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 33

48 Mantra
25/33
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदूव॑ध्यमु॒दर॑स्याप॒वाति॒ यऽआ॒मस्य॑ क्र॒विषो॑ ग॒न्धोऽअस्ति॑।सु॒कृ॒ता तच्छ॑मि॒तारः॑ कृण्वन्तू॒त मेध॑ꣳ शृत॒पाकं॑ पचन्तु॥३३॥

यत्। ऊव॑ध्यम्। उ॒दर॑स्य। अ॒प॒वातीत्य॑प॒ऽवाति॑। यः। आ॒मस्य॑। क्र॒विषः॑। ग॒न्धः। अस्ति॑। सु॒कृ॒तेति॑ सुऽकृ॒ता। तत्। श॒मि॒तारः॑। कृ॒ण्व॒न्तु॒। उ॒त। मेध॑म्। शृ॒त॒पाक॒मिति॑ शृत॒ऽपाक॑म्। प॒च॒न्तु॒ ॥३३ ॥

Mantra without Swara
यदूवध्यमुदरस्यापवाति यऽआमस्य क्रविषो गन्धोऽअस्ति । सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेधँ शृतपाकम्पचन्तु ॥

यत्। ऊवध्यम्। उदरस्य। अपवातीत्यपऽवाति। यः। आमस्य। क्रविषः। गन्धः। अस्ति। सुकृतेति सुऽकृता। तत्। शमितारः। कृण्वन्तु। उत। मेधम्। शृतपाकमिति शृतऽपाकम्। पचन्तु॥३३॥

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Meaning
हे मनुष्यो! (उदरस्य) पेट के कोष्ठ से (यत्) जो (ऊवध्यम्) मलीन मल (अपवाति) निकलता और (यः) जो (आमस्य) न पके कच्चे (क्रविषः) खाये हुए पदार्थ का (गन्धः) गन्ध (अस्ति) है (तत्) उस को (शमितारः) शान्ति करने अर्थात् आराम देने वाले (सुकृता) अच्छा सिद्ध (कृण्वन्तु) करें (उत) और (मेधम्) पवित्र (शृतपाकम्) जिसका सुन्दर पाक बने उस को (पचन्तु) पकावें॥३३॥
Essence
जो लोग यज्ञ करना चाहें वे दुर्गन्धयुक्त पदार्थ को छोड़ सुगन्धि आदि युक्त सुन्दरता से बना पाक कर अग्नि में होम करें, वे जगत् का हित चाहने वाले होते हैं॥३३॥
Subject
फिर कौन किसलिये क्या न करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥