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Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 20

48 Mantra
25/20
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पृष॑दश्वा म॒रुतः॒ पृश्नि॑मातरः शुभं॒ यावा॑नो वि॒दथे॑षु जग्म॑यः।अ॒ग्नि॒जि॒ह्वा मन॑वः॒ सूर॑चक्षसो॒ विश्वे॑ नो दे॒वाऽअव॒साग॑मन्नि॒ह॥२०॥

पृष॑दश्वा॒ इति॒ पृष॑त्ऽअश्वाः। म॒रुतः॑। पृश्नि॑मातर॒ इति॒ पृश्नि॑ऽमातरः। शु॒भं॒यावा॑न॒ इति॑ शुभ॒म्ऽयावा॑नः। वि॒दथे॑षु जग्म॑यः अ॒ग्नि॒जि॒ह्वा इत्य॑ग्निऽजिह्वाः। मन॑वः। सूर॑चक्षस॒ इति॒ सूर॑ऽचक्षसः। विश्वे॑। नः॒। दे॒वाः। अव॑सा। आ। अ॒ग॒म॒न्। इ॒ह ॥२० ॥

Mantra without Swara
पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभँयावानो विदथेषु जग्मयः । अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवाऽअवसा गमन्निह ॥

पृषदश्वा इति पृषत्ऽअश्वाः। मरुतः। पृश्निमातर इति पृश्निऽमातरः। शुभंयावान इति शुभम्ऽयावानः। विदथेषु जग्मयः अग्निजिह्वा इत्यग्निऽजिह्वाः। मनवः। सूरचक्षस इति सूरऽचक्षसः। विश्वे। नः। देवाः। अवसा। आ। अगमन्। इह॥२०॥

Meaning
जो (पृश्निमातरः) जिनको मान्य देने वाला अन्तरिक्ष माता के तुल्य है, उन वायुओं के समान (पृषदश्वाः) जिनके पुष्टि आदि से सींचे अङ्गों वाले घोड़े हैं, वे (मरुतः) मनुष्य तथा (विदथेषु) संग्रामों में (शुभंयावानः) जो उत्तम सुख को प्राप्त होने और (जग्मयः) संग करने वाले (अग्निजिह्वाः) जिनकी अग्नि के समान प्रकाशित वाणी और (सूरचक्षसः) जिन का ऐश्वर्य वा प्रेरणा में दर्शन होवे, ऐसे (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् (मनवः) जन (अवसा) रक्षा आदि के साथ वर्त्तमान हैं, वे लोग (इह) इस संसार वा इस समय में (नः) हम लोगों को (आ, अगमन्) प्राप्त होवें॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को विद्वानों का संग सदैव प्रार्थना करने योग्य है। जैसे इस जगत् में सब वायु आदि पदार्थ सब मनुष्यों वा प्राणियों के जीवन के हेतु हैं, वैसे इस जगत् में चेतनों में विद्वान् हैं॥२०॥
Subject
फिर कौन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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