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Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 15

48 Mantra
25/15
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिर्ऋ॑जूय॒तां दे॒वाना॑ रा॒तिर॒भि नो॒ निव॑र्त्तताम्।दे॒वाना॑ स॒ख्यमुप॑सेदिमा व॒यं दे॒वा न॒ऽआयुः॒ प्रति॑रन्तु जी॒वसे॑॥१५॥

दे॒वाना॑म्। भ॒द्रा। सु॒म॒तिरिति॑ सुऽम॒तिः। ऋ॒जूय॒ताम्। ऋ॒जु॒य॒तामित्यृ॑जुऽय॒ताम्। दे॒वाना॑म्। रा॒तिः। अ॒भि। नः॒। नि। व॒र्त्त॒ता॒म्। दे॒वाना॑म्। स॒ख्यम्। उप॑। से॒दि॒म॒। आ। व॒यम्। दे॒वाः। नः॒। आयुः॑। प्र। ति॒र॒न्तु॒। जी॒वसे॑ ॥१५ ॥

Mantra without Swara
देवानाम्भद्रा सुमतिरृजूयतान्देवानाँ रातिरभि नो नि वर्तताम् । देवानाँ सख्यमुपसेदिमा वयन्देवा नऽआयुः प्रतिरन्तु जीवसे ॥

देवानाम्। भद्रा। सुमतिरिति सुऽमतिः। ऋजूयताम्। ऋजुयतामित्यृजुऽयताम्। देवानाम्। रातिः। अभि। नः। नि। वर्त्तताम्। देवानाम्। सख्यम्। उप। सेदिम। आ। वयम्। देवाः। नः। आयुः। प्र। तिरन्तु। जीवसे॥१५॥

Meaning
हे मनुष्यो! जैसे (देवानाम्) विद्वानों की (भद्रा) कल्याण करने वाली (सुमतिः) उत्तम बुद्धि हम लोगों को और (ऋजूयताम्) कठिन विषयों को सरल करते हुए (देवानाम्) देने वाले विद्वानों का (रातिः) विद्या आदि पदार्थों का देना (नः) हम लोगों को (अभि, नि, वर्त्तताम्) सब ओर से सिद्ध करे, सब गुणों से पूर्ण करे (वयम्) हम लोग (देवानाम्) विद्वानों की (सख्यम्) मित्रता को (उपा, सेदिम) अच्छे प्रकार पावें (देवाः) विद्वान् (नः) हम को (जीवसे) जीने के लिये (आयुः) जिस से प्राण का धारण होता, उस आयुर्दा को (प्र, तिरन्तु) पूरी भुगावें, वैसे तुम्हारे प्रति वर्त्ताव रक्खें॥१५॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिये कि पूर्ण शास्त्रवेत्ता विद्वानों के समीप से उत्तम बुद्धियों को पाकर ब्रह्मचर्य आश्रम से आयु को बढ़ा के सदैव धार्मिक जनों के साथ मित्रता रक्खें॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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