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Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 6

65 Mantra
23/6
Devata- सूर्यो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराडगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा॥६॥

यु॒ञ्जन्ति॑। अ॒स्य॒। काम्या॑। हरी॒ऽइति॒ हरी॑। विप॑क्ष॒सेति॒ विऽप॑क्षसा। रथे॑। शोणा॑। धृ॒ष्णूऽइति॑ धृ॒ष्णू। नृ॒वाह॒सेति॑ नृ॒ऽवाह॑सा ॥६ ॥

Mantra without Swara
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे । शोणा धृष्णू नृसाहसा ॥

युञ्जन्ति। अस्य। काम्या। हरीऽइति हरी। विपक्षसेति विऽपक्षसा। रथे। शोणा। धृष्णूऽइति धृष्णू। नृवाहसेति नृऽवाहसा॥६॥

Meaning
हे मनुष्यो! जैसे शिक्षा करने वाले सज्जन (काम्या) मनोहर (हरी) ले जाने हारे (विपक्षसा) जो कि विविध प्रकारों से भलीभांति ग्रहण किये हुए (शोणा) लाल-लाल रंग से युक्त (धृष्णू) अतिपुष्ट (नृवाहसा) मनुष्यों को एक देश से दूसरे देश को पहुंचाने हारे दो घोड़ों को (रथे) में (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, वैसे योगीजन (अस्य) इस परमेश्वर के बीच इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और प्राणों को युक्त करते हैं॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य अच्छे सिखाये हुए घोड़ों से युक्त रथ से एक स्थान से दूसरे स्थान को शीघ्र प्राप्त होते हैं, वैसे ही विद्या, सज्जनों का संग और योगाभ्यास से परमात्मा को शीघ्र प्राप्त होते हैं॥६॥
Subject
अब किससे ईश्वर की प्राप्ति होने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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