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Yajurveda - Mantra 51

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 51

65 Mantra
23/51
Devata- पुरुषेश्वरो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
केष्व॒न्तः पुरु॑ष॒ऽआ वि॑वेश॒ कान्य॒न्तः पुरु॑षे॒ऽअर्पि॑तानि।ए॒तद् ब्र॑ह्म॒न्नुप॑ वल्हामसि त्वा॒ किस्वि॑न्नः॒ प्रति॑ वोचा॒स्यत्र॑॥५१॥

केषु॑। अ॒न्तरित्य॒न्तः। पुरु॑षः। आ। वि॒वे॒श॒। कानि॑। अ॒न्तरित्य॒न्तः। पुरु॑षे। अर्पि॑तानि। ए॒तत्। ब्र॒ह्म॒न्। उप॑। व॒ल्हा॒म॒सि॒। त्वा॒। किम्। स्वि॒त्। नः॒। प्रति॑। वो॒चा॒सि॒। अत्र॑ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
केष्वन्तः पुरुषऽआ विवेश कान्यन्तः पुरुषेऽअर्पितानि । एतद्ब्रह्मन्नुपवल्हामसि त्वा किँ स्विन्नः प्रति वोचास्यत्र ॥

केषु। अन्तरित्यन्तः। पुरुषः। आ। विवेश। कानि। अन्तरित्यन्तः। पुरुषे। अर्पितानि। एतत्। ब्रह्मन्। उप। वल्हामसि। त्वा। किम्। स्वित्। नः। प्रति। वोचासि। अत्र॥५१॥

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Meaning
हे (ब्रह्मन्) वेदज्ञ विद्वन्! (केषु) किन में (पुरुषः) सर्वत्र पूर्ण परमेश्वर (अन्तः) भीतर (आ, विवेश) प्रवेश कर रहा है और (कानि) कौन (पुरुषे) पूर्ण ईश्वर में (अन्तः) भीतर (अर्पितानि) स्थापन किये हैं, जिस ज्ञान से हम लोग (उप, वल्हामसि) प्रधान हों (एतत्) यह (त्वा) आपको पूछते हैं सो (किं, स्वित्) क्या है (अत्र) इसमें (नः) हमारे (प्रति) प्रति (वोचासि) कहिये॥५१॥
Essence
इतर मनुष्यों को चाहिये कि चारों वेद के ज्ञाता विद्वान् को ऐसे पूछें कि हे वेदज्ञ विद्वन्! पूर्ण परमेश्वर किन में प्रविष्ट है? और कौन उसके अन्तर्गत हैं? यह बात आप से पूछी है, यथार्थता से कहिये जिसके ज्ञान से हम उत्तम पुरुष हों॥५१॥
Subject
अब ईश्वर-विषय में दो प्रश्न कहते हैं॥