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Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 38

65 Mantra
23/38
Devata- सभासदो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यव॑ञ्चि॒द्यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑।इ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नम॑ऽउक्तिं॒ यज॑न्ति॥३८॥

कु॒वित्। अ॒ङ्ग। यव॑मन्त इति॒ यव॑ऽमन्तः। यव॑म्। चि॒त्। यथा॑। दान्ति॑। अ॒नु॒पू॒र्वमित्य॑नुऽपू॒र्वम्। वि॒यूयेति॑ वि॒ऽयूय॑। इ॒हेहेती॒हऽइ॑ह। ए॒षा॒म्। कृ॒णु॒हि॒। भोज॑नानि। ये। ब॒र्हिषः॑। नम॑ऽउक्ति॒मिति॒ नमः॑ऽउक्तिम्। यज॑न्ति ॥३८ ॥

Mantra without Swara
कुविदङ्ग यवमन्तो वयञ्चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वँवियूय । इहेहैषाङ्कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमऽउक्तिँयजन्ति ॥

कुवित्। अङ्ग। यवमन्त इति यवऽमन्तः। यवम्। चित्। यथा। दान्ति। अनुपूर्वमित्यनुऽपूर्वम्। वियूयेति विऽयूय। इहेहेतीहऽइह। एषाम्। कृणुहि। भोजनानि। ये। बर्हिषः। नमऽउक्तिमिति नमःऽउक्तिम्। यजन्ति॥३८॥

Meaning
हे (अङ्ग) मित्र! (कुवित्) बहुत विज्ञानयुक्त तू (इहेह) इस-इस व्यवहार में (एषाम्) इन मनुष्यों से (यथा) जैसे (यवमन्तः) बहुत जौ आदि अन्नयुक्त खेती करने वाले (यवम्) जौ आदि अनाज के समूह को बुस आदि से (वियूय) पृथक् कर (चित्) और (अनुपूर्वम्) क्रम से (दान्ति) छेदन करते हैं, उनके और (ये) जो (बर्हिषः) जल वा (नमउक्तिम्) अन्नसम्बन्धी वचन को (यजन्ति) कहकर सत्कार करते हैं, उनके (भोजनानि) भोजनों को (कृणुहि) करो॥३८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे पढ़ाने और पढ़ने वालो! तुम लोग जैसे खेती करनेहारे एक-दूसरे के खेत को पारी से काटते और भूसा से अन्न को अलग कर औरों को भोजन कराके फिर आप भोजन करते हैं, वैसे ही यहां विद्या के व्यवहार में निष्कपट भाव से विद्यार्थियों को पढ़ाने वालों की सेवा और पढ़ाने वालों को विद्यार्थियों की विद्यावृद्धि कर एक-दूसरे को खान-पान से सत्कार कर सब कोई आनन्द भोगें॥३८॥
Subject
अब पढ़ने और पढ़ाने हारे कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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