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Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 28

65 Mantra
23/28
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यद॑स्याऽअꣳहु॒भेद्याः॑ कृ॒धु स्थू॒लमु॒पात॑सत्। मु॒ष्काविद॑स्याऽएजतो गोश॒फे श॑कु॒लावि॑व॥२८॥

यत्। अ॒स्याः॒। अ॒ꣳहु॒भेद्या॒ऽइत्य॑ꣳहु॒ऽभेद्याः॑। कृ॒धु। स्थू॒लम्। उ॒पात॑स॒दित्यु॑प॒ऽअत॑सत्। मु॒ष्कौ। इत्। अ॒स्याः॒। ए॒ज॒तः॒। गो॒श॒फ इति॑ गोऽश॒फे। श॒कु॒लावि॒वेति॑ शकु॒लौऽइ॑व ॥२८ ॥

Mantra without Swara
यदस्याऽअँहुभेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत् । मुष्काविदस्याऽएजतो गोशफे शकुलाविव ॥

यत्। अस्याः। अꣳहुभेद्याऽइत्यꣳहुऽभेद्याः। कृधु। स्थूलम्। उपातसदित्युपऽअतसत्। मुष्कौ। इत्। अस्याः। एजतः। गोशफ इति गोऽशफे। शकुलाविवेति शकुलौऽइव॥२८॥

Meaning
(यत्) जो राजा वा राजपुरुष (अस्याः) इस (अंहुभेद्याः) अपराध का विनाश करने वाली प्रजा के (कृधु) थोड़े और (स्थूलम्) बहुत कर्म को (उपातसत्) सुशोभित करें, वे दोनों (अस्याः) इसको (एजतः) कर्म कराते हैं और वे आप (गोशफे) गौ के खुर से भूमि में हुए गढ़ेले में (शकुलाविव) छोटी दो मछलियों के समान (मुष्कौ, इत्) प्रजा से पाये हुए कर को चोरते हुए कंपते हैं॥२८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे एक-दूसरे से प्रीति रखने वाली मछली छोटी ताल तलैया में निरन्तर बसती है, वैसे राजा और राजपुरुष थोड़े भी कर के लाभ में न्यायपूर्वक प्रीति के साथ वर्त्तें और यदि दुःख को दूर करने वाली प्रजा के थोड़े बहुत उत्तम काम की प्रंशसा करें तो वे दोनों प्रजाजनों को प्रसन्न कर अपने में उनसे प्रीति करावें॥२८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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