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Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 23

65 Mantra
23/23
Devata- राजप्रजे देवते Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य॒कोऽस॒कौ श॑कुन्त॒कऽआ॒हल॒गिति॒ वञ्च॑ति। विव॑क्षतऽइव ते॒ मुख॒मध्व॑र्यो॒ मा न॒स्त्वम॒भि भा॑षथाः॥२३॥

य॒कः। अ॒स॒कौ। श॒कु॒न्त॒कः। आ॒हल॑क्। इति॑। वञ्च॑ति। विव॑क्षतऽइ॒वेति॒ विव॑क्षतःऽइव। ते॒। मुख॑म्। अध्व॑र्यो॒ऽइत्यध्व॑र्यो। मा। नः॒। त्वम्। अ॒भि। भा॒ष॒थाः॒ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
यकोसकौ शकुन्तकऽआहलगिति वञ्चति । विवक्षतऽइव ते मुखमध्वर्या मा नस्त्वमभि भाषथाः ॥

यकः। असकौ। शकुन्तकः। आहलक्। इति। वञ्चति। विवक्षतऽइवेति विवक्षतःऽइव। ते। मुखम्। अध्वर्योऽइत्यध्वर्यो। मा। नः। त्वम्। अभि। भाषथाः॥२३॥

Meaning
हे (अध्वर्यो) यज्ञ के समान आचरण करने हारे राजा! (त्वम्) तू (नः) हम लोगों के प्रति (मा, अभिभाषथाः) झूठ मत बोलो और (विवक्षत इव) बहुत गप्प-सप्प बकते हुए मनुष्य के मुख के समान (ते) तेरा (मुखम्) मुख मत हो, यदि इस प्रकार (यकः) जो (असकौ) यह राजा गप्प-सप्प करेगा तो (शकुन्तकः) निर्बल पखेरू के समान (आहलक्) भलीभांति उच्छिन्न जैसे हो (इति) इस प्रकार (वञ्चति) ठगा जायेगा॥२३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा कभी झूठी प्रतिज्ञा करने और कटुवचन बोलने वाला न हो तथा न किसी को ठगे, जो यह राजा अन्याय करे तो आप भी प्रजाजनों से ठगा जाये॥२३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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