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Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 21

65 Mantra
23/21
Devata- न्यायधीशो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उत्स॑क्थ्या॒ऽअव॑ गु॒दं धे॑हि॒ सम॒ञ्जिं चा॑रया वृषन्। य स्त्री॒णां जी॑व॒भोज॑नः॥२१॥

उत्स॑क्थ्या॒ इत्युत्ऽस॑क्थ्याः। अव॑। गु॒दम्। धे॒हि॒। सम्। अ॒ञ्जिम्। चा॒र॒य॒। वृ॒ष॒न्। यः। स्त्री॒णाम्। जी॒व॒भोज॑न॒ इति॑ जीव॒ऽभोज॑नः ॥२१ ॥

Mantra without Swara
उत्सक्थ्याऽअव गुदन्धेहि समञ्जिञ्चारया वृषन् । य स्त्रीणाञ्जीवभोजनः ॥

उत्सक्थ्या इत्युत्ऽसक्थ्याः। अव। गुदम्। धेहि। सम्। अञ्जिम्। चारय। वृषन्। यः। स्त्रीणाम्। जीवभोजन इति जीवऽभोजनः॥२१॥

Meaning
हे (वृषन्) शक्तिमन्! (यः) जो (स्त्रीणाम्) स्त्रियों के बीच (जीवभोजनः) प्राणियों का मांस खाने वाला व्यभिचारी पुरुष वा पुरुषों के बीच उक्त प्रकार की व्यभिचारिणी स्त्री वर्त्तमान हो, उस पुरुष और स्त्री को बांध कर (उत्सक्थ्याः) ऊपर को पग और नीचे को शिर कर ताड़ना करके और अपनी प्रजा के मध्य (अव, गुदम्) उत्तम सुख को (धेहि) धारण करो और (अञ्जिम्) अपने प्रकट न्याय को (सञ्चारय) भलीभांति चलाओ॥२१॥
Essence
हे राजन्! जो विषय-सेवा में रमते हुए जन वा वैसी स्त्री व्यभिचार को बढ़ावें, उन-उन को प्रबल दण्ड से शिक्षा देनी चाहिये॥२१॥
Subject
फिर राजा को दुष्टाचारी प्राणी भलीभांति दण्ड देने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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