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Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 13

34 Mantra
22/13
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा॒तिꣳ सत्प॑तिं म॒हे स॑वि॒तार॒मुप॑ ह्वये। आ॒स॒वं दे॒ववी॑तये॥१३॥

रा॒तिम्। सत्प॑ति॒मिति॒। सत्ऽप॑तिम्। म॒हे। स॒वि॒तार॑म्। उप॑। ह्वये॒। आ॒स॒वमित्या॑ऽस॒वम्। दे॒ववी॑तय॒ऽइति॑ दे॒ववी॑तये ॥१३ ॥

Mantra without Swara
रातिँ सत्पतिम्महे सवितारमुपह्वये । आसवन्देववीतये ॥

रातिम्। सत्पतिमिति। सत्ऽपतिम्। महे। सवितारम्। उप। ह्वये। आसवमित्याऽसवम्। देववीतयऽइति देववीतये॥१३॥

Meaning
हे मनुष्यो! जैसे मैं (महे) बड़ी (देववीतये) दिव्यगुण और विद्वानों की प्राप्ति के लिये (रातिम्) देने हारे (आसवम्) सब ओर से ऐश्वर्ययुक्त (सत्पतिम्) सत्य वा नित्य विद्यमान जीव वा पदार्थों की पालना करने और (सवितारम्) समस्त संसार को उत्पन्न करने हारे जगदीश्वर की (उपह्वये) ध्यानयोग से समीप में स्तुति करूं, वैसे तुम भी इसकी प्रशंसा करो॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि मनुष्य धर्म अर्थ और काम की सिद्धि को चाहें तो परमात्मा की ही उपासना कर उस ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तें॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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