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Yajurveda - Mantra 28

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 28

90 Mantra
20/28
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सि॒ञ्चन्ति॒ परि॑ षिञ्च॒न्त्युत्सि॑ञ्चन्ति पु॒नन्ति॑ च।सुरा॑यै ब॒भ्वै्र मदे॑ कि॒न्त्वो व॑दति कि॒न्त्वः॥२८॥

सि॒ञ्चन्ति॒। परि॑। सि॒ञ्च॒न्ति॒। उत्। सि॒ञ्च॒न्ति॒। पु॒नन्ति॑। च॒। सुरा॑यै। ब॒भ्र्वै। मदे॑। कि॒न्त्वः। व॒द॒ति॒। कि॒न्त्वः ॥२८ ॥

Mantra without Swara
सिञ्चन्ति परि षिञ्चन्त्युत्सिञ्चन्ति पुनन्ति च । सुरायै बर्भ्वै मदे किन्त्वो वदति किन्त्वः ॥

सिञ्चन्ति। परि। सिञ्चन्ति। उत् । सिञ्चन्ति। पुनन्ति। च। सुरायै। बभ्वै्र। मदे। किन्त्वः। वदति। किन्त्वः॥२८॥

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Meaning
जो (बभ्वै्र) बल के धारण करनेहारे (सुरायै) सोम वा (मदे) आनन्द के लिये महौषधियों के रस को (सिञ्चन्ति) जाठराग्नि में सींचते सेवन करते (परि, सिञ्चन्ति) सब ओर से पीते (उत्सिञ्चन्ति) उत्कृष्टता से ग्रहण करते (च) और (पुनन्ति) पवित्र होते हैं, वे शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होते हैं और जो (किन्त्वः) क्या वह (किन्त्वः) क्या और ऐसा (वदति) कहता है, वह कुछ भी नहीं पाता है॥२८॥
Essence
जो अन्नादि को पवित्र और संस्कार कर उत्तम रसों से युक्त करके युक्त आहार-विहार से खाते पीते हैं, वे बहुत सुख को प्राप्त होते हैं, जो मूढ़ता से ऐसा नहीं करता, वह बलबुद्धिहीन हो निरन्तर दुःख को भोगता है॥२८॥
Subject
अब विद्वानों के विषय में शरीरसम्बन्धी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥