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Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 86

95 Mantra
19/86
Devata- सविता देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒न्त्राणि॑ स्था॒लीर्मधु॒ पिन्व॑माना॒ गुदाः॒ पात्रा॑णि सु॒दुघा॒ न धे॒नुः। श्ये॒नस्य॒ पत्रं॒ न प्ली॒हा शची॑भिरास॒न्दी नाभि॑रु॒दरं॒ न मा॒ता॥८६॥

आ॒न्त्राणि॑। स्था॒लीः। मधु॑। पिन्व॑मानाः। गुदाः॑। पात्रा॑णि। सु॒दुघेति॑ सु॒ऽदुघा॑। न। धे॒नुः। श्ये॒नस्य॑। पत्र॑म्। न। प्ली॒हा। शची॑भिः। आ॒स॒न्दीत्या॑ऽस॒न्दी। नाभिः॑। उ॒दर॑म्। न। मा॒ता ॥८६ ॥

Mantra without Swara
आन्त्राणि स्थालीर्मधु पिन्वमाना गुदाः पात्राणि सुदुघा न धेनुः । श्येनस्य पत्रन्न प्लीहा शचीभिरासन्दी नाभिरुदरन्न माता ॥

आन्त्राणि। स्थालीः। मधु। पिन्वमानाः। गुदाः। पात्राणि। सुदुघेति सुऽदुघा। न। धेनुः। श्येनस्य। पत्रम्। न। प्लीहा। शचीभिः। आसन्दीत्याऽसन्दी। नाभिः। उदरम्। न। माता॥८६॥

Meaning
युक्ति वाले पुरुष को योग्य है कि (शचीभिः) उत्तम बुद्धि और कर्मों से (स्थालीः) दाल आदि पकाने के बर्त्तनों को अग्नि के ऊपर धर ओषधियों का पाक बना (मधु) उसमें सहत डाल भोजन करके (आन्त्राणि) उदरस्थ अन्न पकाने वाली नाडि़यों को (पिन्वमानाः) सेवन करते हुए प्रीति के हेतु (गुदाः) गुदेन्द्रियादि तथा (पात्राणि) जिनसे खाया-पिया जाय, उन पात्रों को (सुदुघा) दुग्धादि से कामना सिद्ध करने वाली (धेनुः) गाय के (न) समान (प्लीहा) रक्तशोधक लोहू का पिण्ड (श्येनस्य) श्येन पक्षी के तथा (पत्रम्) पांख के (न) समान (माता) और माता के (न) तुल्य (आसन्दी) सब ओर से रस प्राप्त करानेहारी (नाभिः) नाभि नाड़ी (उदरम्) उदर को पुष्ट करती है॥८६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य लोग उत्तम संस्कार किये हुए उत्तम अन्न और रसों से शरीर को रोगरहित करके प्रयत्न करते हैं, वे अभीष्ट सुख को प्राप्त होते हैं॥८६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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