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Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 61

95 Mantra
19/61
Devata- पितरो देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्नि॒ष्वा॒त्तानृ॑तु॒मतो॑ हवामहे नाराश॒ꣳसे सो॑मपी॒थं यऽआ॒शुः। ते नो॒ विप्रा॑सः सु॒हवा॑ भवन्तु व॒य स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥६१॥

अ॒ग्नि॒ष्वा॒त्तान्। अ॒ग्नि॒स्वा॒त्तानित्य॑ग्निऽस्वा॒त्तान्। ऋ॒तु॒मत॒ इत्यृ॑तु॒ऽमतः॑। ह॒वा॒म॒हे॒। ना॒रा॒श॒ꣳसे। सो॒म॒पी॒थमिति॑ सोमऽपी॒थम्। ये। आ॒शुः। ते। नः॒। विप्रा॑सः। सु॒हवा॒ इति॑ सु॒ऽहवाः॑। भ॒व॒न्तु॒। व॒यम्। स्या॒म॒। पत॑यः। र॒यी॒णाम्। ॥६१ ॥

Mantra without Swara
अग्निष्वात्ताँऽऋतुमतो हवामहे नाराशँसे सोमपीथँयऽआशुः । ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयँस्याम पतयो रयीणाम् ॥

अग्निष्वात्तान्। अग्निस्वात्तानित्यग्निऽस्वात्तान्। ऋतुमत इत्यृतुऽमतः। हवामहे। नाराशꣳसे। सोमपीथमिति सोमऽपीथम्। ये। आशुः। ते। नः। विप्रासः। सुहवा इति सुऽहवाः। भवन्तु। वयम्। स्याम। पतयः। रयीणाम्।॥६१॥

Meaning
(ये) जो (सोमपथीम्) सोम आदि उत्तम ओषधिरस को (आशुः) पीवें, जिन (ऋतुमतः) प्रशंसित वसन्तादि ऋतु में उत्तम कर्म करने वाले (अग्निष्वात्तान्) अच्छे प्रकार अग्निविद्या को जाननेहारे पिता आदि ज्ञानियों को हम लोग (नाराशंसे) मनुष्यों के प्रशंसारूप सत्कार के व्यवहार में (हवामहे) बुलाते हैं, (ते) वे (विप्रासः) बुद्धिमान् लोग (नः) हमारे लिये (सुहवाः) अच्छे दान देनेहारे (भवन्तु) हों और (वयम्) हम उनकी कृपा से (रयीणाम्) धनों के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें॥६१॥
Essence
सन्तान लोग पदार्थविद्या और देश, काल के जानने और प्रशंसित औषधियों के रस को सेवन करनेहारे, विद्या और अवस्था में वृद्ध पिता आदि को सत्कार के अर्थ बुला के, उनके सहाय से धनादि ऐश्वर्य्य वाले हों॥६१॥
Subject
माता-पिता और सन्तानों को परस्पर क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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