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Yajurveda - Mantra 54

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 54

95 Mantra
19/54
Devata- सोमो देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वꣳ सो॑म पि॒तृभिः॑ संविदा॒नोऽनु॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽआ त॑तन्थ। तस्मै॑ तऽइन्दो ह॒विषा॑ विधेम व॒य स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥५४॥

त्वम्। सो॒म॒। पि॒तृभि॒रिति॑ पि॒तृऽभिः॑। सं॒वि॒दा॒न इति॑ सम्ऽविदा॒नः। अनु॑। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। आ। त॒त॒न्थ॒। तस्मै॑। ते॒। इ॒न्दो॒ऽइति॑ इन्दो। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒। व॒यम्। स्या॒म॒। पत॑यः। र॒यी॒णाम् ॥५४ ॥

Mantra without Swara
त्वँ सोम पितृभिः सँविदानोनु द्यावापृथिवीऽआ ततन्थ । तस्मैऽत इन्दो हविषा विधेम वयँ स्याम पतयो रयीणाम् ॥

त्वम्। सोम। पितृभिरिति पितृऽभिः। संविदान इति सम्ऽविदानः। अनु। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। आ। ततन्थ। तस्मै। ते। इन्दोऽइति इन्दो। हविषा। विधेम। वयम्। स्याम। पतयः। रयीणाम्॥५४॥

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Meaning
हे (सोम) चन्द्रमा के सदृश आनन्दकारक उत्तम सन्तान! (पितृभिः) ज्ञानयुक्त पितरों के साथ (संविदानः) प्रतिज्ञा करता हुआ जो (त्वम्) तू (अनु, द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी के मध्य में धर्मानुकूल आचरण से सुख का (आ, ततन्थ) विस्तार कर। हे (इन्दो) चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन! (तस्मै) उस (ते) तेरे लिये (वयम्) हम लोग (हविषा) लेने-देने योग्य व्यवहार से सुख का (विधेम) विधान करें, जिससे हम लोग (रयीणाम्) धनों के (पतयः) पालन करनेहारे स्वामी (स्याम) हों॥५४॥
Essence
हे सन्तानो! तुम लोग जैसे चन्द्रलोक पृथिवी के चारों और भ्रमण करता हुआ सूर्य की परिक्रमा देता है, वैसे ही माता-पिता आदि के अनुचर होओ, जिससे तुम श्रीमन्त हो जाओ॥५४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥