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Yajurveda - Mantra 45

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 45

95 Mantra
19/45
Devata- पितरो देवताः Rishi- वैखानस ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ये स॑मा॒नाः सम॑नसः पि॒तरो॑ यम॒राज्ये॑। तेषां॑ लो॒कः स्व॒धा नमो॑ य॒ज्ञो दे॒वेषु॑ कल्पताम्॥४५॥

ये। स॒मा॒नाः। सम॑नस॒ इति॒ सऽम॑नसः। पि॒तरः॑। य॒म॒राज्य॒ इति॑ यम॒ऽराज्ये॑। तेषा॑म्। लो॒कः। स्व॒धा। नमः॑। य॒ज्ञः। दे॒वेषु॑। क॒ल्प॒ता॒म् ॥४५ ॥

Mantra without Swara
ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये । तेषाँलोकः स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पताम् ॥

ये। समानाः। समनस इति सऽमनसः। पितरः। यमराज्य इति यमऽराज्ये। तेषाम्। लोकः। स्वधा। नमः। यज्ञः। देवेषु। कल्पताम्॥४५॥

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Meaning
(ये) जो (समानाः) सदृश (समनसः) तुल्य विज्ञानयुक्त (पितरः) प्रजा के रक्षक लोग (यमराज्ये) यथावत् न्यायकारी सभाधीश राजा के राज्य में हैं, (तेषाम्) उनका (लोकः) सभा का दर्शन (स्वधा) अन्न (नमः) सत्कार और (यज्ञः) प्राप्त होने योग्य न्याय (देवेषु) विद्वानों में (कल्पताम्) समर्थ होवे॥४५॥
Essence
जहां बहुदर्शी अन्नादि ऐश्वर्य से संयुक्त सज्जनों से सत्कार को प्राप्त एक धर्म ही में जिनकी निष्ठा है, उन विद्वानों की सभा सत्यन्याय को करती है, उसी राज्य में सब मनुष्य ऐश्वर्य्य और सुख में निवास करते हैं॥४५॥
Subject
कहां मनुष्य सुखपूर्वक निवास करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥