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Yajurveda - Mantra 20

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 20

95 Mantra
19/20
Devata- यजमानो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प॒शुभिः॑ प॒शूना॑प्नोति पुरो॒डाशै॑र्ह॒वीष्या। छन्दो॑भिः सामिधे॒नीर्या॒ज्याभिर्वषट्का॒रान्॥२०॥

प॒शुभि॒रिति॑ प॒शुभिः॑। प॒शून्। आ॒प्नो॒ति॒। पु॒रो॒डाशैः॑। ह॒वीषि॑। आ। छन्दो॑भि॒रिति॒ छन्दः॑ऽभिः। सा॒मि॒धे॒नीरिति॑ साम्ऽइधे॒नीः। या॒ज्या᳖भिः। व॒ष॒ट्का॒रानिति॑ वषट्ऽका॒रान् ॥२० ॥

Mantra without Swara
पशुभिः पशूनाप्नोति पुरोडाशैर्हवीँष्या । छन्दोभिः सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारान् ॥

पशुभिरिति पशुभिः। पशून्। आप्नोति। पुरोडाशैः। हवीषि। आ। छन्दोभिरिति छन्दःऽभिः। सामिधेनीरिति साम्ऽइधेनीः। याज्याभिः। वषट्कारानिति वषट्ऽकारान्॥२०॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जैसे सद्गृहस्थ (पशुभिः) गवादि पशुओं से (पशून्) गवादि पशुओं को (पुरोडाशैः) पचन क्रियाओं से पके हुए उत्तम पदार्थों से (हवींषि) हवन करते योग्य उत्तम पदार्थों को (छन्दोभिः) गायत्री आदि छन्दों की विद्या से (सामिधेनीः) जिससे अग्नि प्रदीप्त हो, उस सुन्दर समिधाओं को (याज्याभिः) यज्ञ की क्रियाओं से (वषट्कारान्) जो धर्मयुक्त क्रिया को करते हैं, उनको (आ, आप्नोति) प्राप्त होता है, वैसे इनको तुम भी प्राप्त होओ॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो संसार में बहुत पशु वाला होम करके, हुतशेष का भोक्ता, वेदवित् और सत्यक्रिया का कर्त्ता मनुष्य होवे, सो प्रशंसा को प्राप्त होता है॥२०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥