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Yajurveda - Mantra 17

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 17

95 Mantra
19/17
Devata- यज्ञो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वेद्या॒ वेदिः॒ समा॑प्यते ब॒र्हिषा॑ ब॒र्हिरि॑न्द्रि॒यम्। यूपे॑न॒ यूप॑ऽआप्यते॒ प्रणी॑तोऽअ॒ग्निर॒ग्निना॑॥१७॥

वेद्या॑। वेदिः॑। सम्। आ॒प्य॒ते॒। ब॒र्हिषा॑। ब॒र्हिः। इ॒न्द्रि॒यम्। यूपे॑न। यूपः॑। आ॒प्य॒ते॒। प्रणी॑तः। प्रनी॑त इति॒ प्रऽनी॑तः। अ॒ग्निः। अ॒ग्निना॑ ॥१७ ॥

Mantra without Swara
वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हिरिन्द्रियम् । यूपेन यूपऽआप्यते प्रणीतोऽअग्निरग्निना ॥

वेद्या। वेदिः। सम्। आप्यते। बर्हिषा। बर्हिः। इन्द्रियम्। यूपेन। यूपः। आप्यते। प्रणीतः। प्रनीत इति प्रऽनीतः। अग्निः। अग्निना॥१७॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् लोग (वेद्या) यज्ञ की सामग्री से (वेदिः) वेदि और (बर्हिषा) महान् पुरुषार्थ से (बर्हिः) बड़ा (इन्द्रियम्) धन (समाप्यते) अच्छे प्रकार प्राप्त किया जाता है, (यूपेन) मिले हुए वा पृथक्-पृथक् व्यवहार से (यूपः) मिला हुआ व्यवहार के यत्न का प्रकाश और (अग्निना) बिजुली आदि अग्नि से (प्रणीतः) अच्छे प्रकार सम्मिलित (अग्निः) अग्नि (आप्यते) प्राप्त कराया जाता है, वैसे ही तुम लोग भी साधनों से साधन मिला कर सब सुखों को प्राप्त होओ॥१७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम साधन से साध्य कार्य्य को सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, वे ही साध्य की सिद्धि करने वाले होते हैं॥१७॥
Subject
किन जनों के कार्य्य सिद्ध होते हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥