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Yajurveda - Mantra 16

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 16

95 Mantra
19/16
Devata- यज्ञो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ॒स॒न्दी रू॒पꣳ रा॑जास॒न्द्यै वेद्यै॑ कु॒म्भी सु॑रा॒धानी॑। अन्त॑रऽउत्तरवे॒द्या रू॒पं का॑रोत॒रो भि॒षक्॥१६॥

आ॒स॒न्दीत्या॑ऽस॒न्दी। रू॒पम्। रा॒जा॒स॒न्द्या इति॑ राजऽआस॒न्द्यै। वेद्यै॑। कु॒म्भी। सु॒रा॒धानीति॑ सुरा॒ऽधानी॑। अन्त॑रः। उ॒त्त॒र॒वे॒द्या इत्यु॑त्तरऽवे॒द्याः। रू॒पम्। का॒रो॒त॒रः। भि॒षक् ॥१६ ॥

Mantra without Swara
आसन्दी रूपँ राजासन्द्यै वेद्यै कुम्भी सुराधानी । अन्तरऽउत्तरवेद्या रूपङ्कारोतरो भिषक् ॥

आसन्दीत्याऽसन्दी। रूपम्। राजासन्द्या इति राजऽआसन्द्यै। वेद्यै। कुम्भी। सुराधानीति सुराऽधानी। अन्तरः। उत्तरवेद्या इत्युत्तरऽवेद्याः। रूपम्। कारोतरः। भिषक्॥१६॥

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Meaning
हे मनुष्यो! तुम लोगों को योग्य है कि यज्ञ के लिये (आसन्दी) जो सब ओर से सेवन की जाती है, वह (रूपम्) सुन्दर क्रिया (राजासन्द्यै) राजा लोग जिस में बैठते हैं, उस (वेद्यै) सुख-प्राप्ति कराने वाली वेदि के अर्थ (कुम्भी) धान्यादि पदार्थों का आधार (सुराधानी) जिसमें सोमरस धरा जाता है, वह गगरी (अन्तरः) जिससे जीवन होता है, यह अन्नादि पदार्थ (उत्तरवेद्याः) उत्तर की वेदी के (रूपम्) रूप को (कारोतरः) कर्मकारी और (भिषक्) वैद्य इन सब का संग्रह करो॥१६॥
Essence
मनुष्य जिस-जिस कार्य के करने की इच्छा करे, उस-उस के समस्त साधनों का सञ्चय करे॥१६॥
Subject
मनुष्य को कैसे कार्य्य साधना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥