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Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 63

77 Mantra
18/63
Devata- यज्ञो देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र॒स्त॒रेण॑ परि॒धिना॑ स्रु॒चा वेद्या॑ च ब॒र्हिषा॑। ऋ॒चेमं य॒ज्ञं नो॑ नय॒ स्वर्दे॒वेषु॒ गन्त॑वे॥६३॥

प्र॒स्त॒रेणेति॑ प्रऽस्त॒रेण॑। प॒रि॒धिनेति॑ परि॒ऽधिना॑। स्रु॒चा। वेद्या॑। च॒। ब॒र्हिषा॑। ऋ॒चा। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। नः॒। न॒य॒। स्वः᳖। दे॒वेषु॑। गन्त॑वे ॥६३ ॥

Mantra without Swara
प्रस्तरेण परिधिना स्रुचा वेद्या च बर्हिषा । ऋचेमँयज्ञन्नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे ॥

प्रस्तरेणेति प्रऽस्तरेण। परिधिनेति परिऽधिना। स्रुचा। वेद्या। च। बर्हिषा। ऋचा। इमम्। यज्ञम्। नः। नय। स्वः। देवेषु। गन्तवे॥६३॥

Meaning
हे विद्वन्! आप (वेद्या) जिसमें होम किया जाता है, उस वेदी तथा (स्रुचा) होमने का साधन (बर्हिषा) उत्तम क्रिया (प्रस्तेरण) आसन (परिधिना) जो सब ओर धारण किया जाय, उस यजुर्वेद (च) तथा (ऋचा) स्तुति वा ऋग्वेद आदि से (इमम्) इस पदार्थमय अर्थात् जिसमें उत्तम भोजनों के योग्य पदार्थ होमे जाते हैं, उस (यज्ञम्) अग्निहोत्र आदि यज्ञ को (देवेषु) दिव्य पदार्थ वा विद्वानों में (गन्तवे) प्राप्त होने के लिये (स्वः) संसारसम्बन्धी सुख (नः) हम लोगों को (नय) पहुँचाओ॥६३॥
Essence
जो मनुष्य धर्म से पाये हुए पदार्थों तथा वेद की रीति से साङ्गोपाङ्ग यज्ञ को सिद्ध करते हैं, वे सब प्राणियों के उपकारी होते हैं॥६३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्रियायज्ञ कैसे सिद्ध करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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